जरुरी जानकारी | लागत विवाद में फंसा केयर्न का राजस्थान ब्लॉक का लाइसेंस, छोटी-छोटी अवधि में बढ़ाया जा रहा अनुबंध

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नयी दिल्ली, 13 सितंबर उद्योगपति अनिल अग्रवाल की अगुवाई वाली केयर्न इंडिया का राजस्थान तेल ब्लॉक के लाइसेंस का विस्तार लागत को लेकर विवाद में फंस गया है। कंपनी अब एक तरह से मासिक अनुबंध के सहारे काम करने को मजबूर है।

सरकार अक्टूबर 2018 में राजस्थान में बाड़मेर फील्ड के लिये अनुबंध 10 साल के लिये बढ़ाने को लेकर सहमत हुई थी। यह सहमति इस बात पर निर्भर थी कि वेदांता समूह की कंपनी ब्लॉक से उत्पादित तेल एवं गैस में सरकार के लाभ में हिस्सेदारी 10 प्रतिशत बढ़ाएगी। यह 25 साल का अनुबंध 14 मई, 2020 को समाप्त होने के बाद बढ़ाया जाना था।

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मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार हालांकि केयर्न ने लाभ में अतिरिक्त हिस्सेदारी देने का विरोध किया है और सरकार के खिलाफ अदालत गयी। उसके बाद से लाइसेंस विस्तार अटका हुआ है। सरकार ने 2,723 करोड़ रुपये के साझा खर्च को वहां विभिन्न तेल फील्डों के बीच पुन: आबंटित करने और पाइपलाइन पर 1,508 करोड़ रुपये की लागत को मंजूरी नहीं देने के बाद कंपनी ने पेट्रोलियम की बिक्र्री में अपने लाभ के तौर पर अतिरिक्त धन की मांग की है । इसके चलते अनुबंध बढ़ाये जाने का मामला अटका हुआ है।

राजस्थान ब्लॉक में मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या तेल फील्ड हैं।

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सरकार चाहती है कि अनुबंध बढ़ाये जाने से पहले कंपनी बकाये का भुगतान करे। वहीं कंपनी ने मांग का विरोध किया है और मतभेद के समाधान को लेकर मध्यस्थता के तहत नोटिस जारी किया गया है।

मामला लंबित होने के बीच सरकार ने पहले कंपनी को राजस्थान ब्लॉक के लिये उत्पादन हिस्सेदारी अनुबंध (पीएससी) तीन महीने बढ़ाते हुए 15 अगस्त तक कर दिया।

सूत्रों ने कहा कि बाद में पीएससी 15 दिनों के लिये और उसके बाद एक महीने (30 सितंबर तक) के लिये बढ़ाया गया।

इस बारे में पूछे जाने पर कंपनी के प्रवक्ता ने कहा, ‘‘राजस्थान परियोजना के उत्पादन में हिस्सेदारी के अनुबंध (पीएससी) के तहत वाणिज्यिक गैस उत्पादन मामले में पहले से चली आ रही शर्तों पर 10 साल के लिये अनुबंध बढ़ाया जाना है। इस आधार पर हम अनुबंध अवधि बढ़ाये जाने के लिये पात्र हैं।’’

कंपनी के अनुसार ब्लॉक देश में कच्चे तेल के उत्पादन में 20 प्रतिशत से अधिक योगदान करता है और अगले तीन साल में इसे दोगुना करने की क्षमता है।

प्रवक्ता ने कहा, ‘‘इसके लिये जरूरी है कि राजकोषीय शुल्कों में कमी की जाए तथा समय पर मंजूरी के लिये प्रशासनिक मदद दी जाए।’’

उसने कहा, ‘‘जब हम मामले को स्वयं से सुलझा नहीं पाये, मामले को अदालत में ले गये।’’

हालांकि उसने इस बारे में विस्तार से कुछ भी कहने से मना कर दिया।

प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हम सकारात्मक परिणाम की उम्मीद करते हैं। हम इस ब्लॉक में उत्पादन और आत्म निर्भर अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान को लेकर प्रतिबद्ध हैं।’’

सूत्रों के अनुसार पेट्रोलिम मंत्रालय के अधीन आने वाला उत्पादन से जुड़ा शीर्ष निकाय हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) ने 26 अक्टूबर, 2018 को पीएससी को 15 मई, 2020 से 10 साल के लिये बढ़ाये जाने को लेकर अपनी मंजूरी दी थी। यह मंजूरी इस बात पर निर्भर थी कि पेट्रोलियम में अतिरिक्त लाभ का भुगतान किया जाएगा।

केयर्न ने मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है और मामला अदालत में विचाराधीन है।

कंपनी का अपने भागीदार सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) के साथ भी ब्लॉकक में किये गये निवेश को लेकर भी विवाद है।

ओएनजीसी की ब्लॉक में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि वेदांता की केयर्न ऑयल एंड गैस की 70 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

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