देश की खबरें | ‘ब्रिक्स’ देशों को सुनिश्चित करना चाहिए कि विकासशील देश शेष ‘कार्बन स्पेस’ का उपयोग करें: भारत

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नयी दिल्ली, 28 जून भारत ने शुक्रवार को कहा कि ‘ब्रिक्स’ देशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकासशील देश उपलब्ध ‘कार्बन स्पेस’ का उपयोग करें।

भारत ने यह भी कहा कि समानता तथा ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमता’ (सीबीडीआर-आरसी) के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए ‘ब्रिक्स’ देश एक साथ खड़े हों।

रूसी संघ की अध्यक्षता में मिश्रित प्रारूप में आयोजित ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की 10वीं बैठक में भाग लेते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने जलवायु वित्त को केवल ‘निवेश’ के रूप में देखने के प्रति आगाह किया।

पांच नये सदस्यों- मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के शामिल होने के बाद ‘ब्रिक्स’ पर्यावरण मंत्रियों की यह पहली बैठक थी।

पर्यावरण मंत्रालय ने एक बयान में यादव के हवाले से कहा, ‘‘एक बड़ा और विशाल ‘ब्रिक्स’ अब पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एजेंडा, प्राथमिकताएं और आगे का रास्ता तय कर सकता है। ब्रिक्स के तहत पहल संयुक्त राष्ट्र प्रणाली और इसकी एजेंसियों के सिद्धांतों और लक्ष्यों द्वारा दृढ़ता से निर्देशित होती है, और ब्रिक्स देशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उपलब्ध कार्बन स्पेस (ताप बढ़ोतरी को सीमित करने के लिए कार्बन बजट के संदर्भ में) विकासशील देशों द्वारा उपयोग किया जाता है।’’

जलवायु विज्ञान ‘कार्बन बजट’ को ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा के रूप में परिभाषित करता है जिन्हें वैश्विक तापमान के एक निश्चित स्तर (इस मामले में 1.5 डिग्री सेल्सियस) के लिए उत्सर्जित किया जा सकता है।

अमीर देशों ने पहले ही वैश्विक कार्बन बजट का 80 प्रतिशत से अधिक उपभोग कर लिया है, जिससे भारत जैसे देशों के पास भविष्य के लिए बहुत कम ‘कार्बन स्पेस’ बचा है।

विकसित देशों के जलवायु कार्रवाई और वित्त के मोर्चे पर खरा नहीं उतरने के कारण भारत सहित विकासशील देशों ने शेष कार्बन बजट में उचित हिस्सेदारी के लिए अपना दावा जताया है।

यादव ने यह भी कहा कि विकासशील देशों को समान अवसर की आवश्यकता है और विकसित देशों को जलवायु संकट और जैव विविधता चुनौतियों से निपटने के लिए वित्त प्रदान करने सहित अपने दायित्वों को पूरा करना चाहिए।

अमीर देशों द्वारा ऋण के रूप में जलवायु वित्त प्रदान किये जाने पर यादव ने कहा, ‘‘जलवायु वित्त को निवेश के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।’’

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