जरुरी जानकारी | जोखिम से बचने की आरबीआई गवर्नर की टिप्पणी से असहमत हैं बैंक अधिकारी, कहा कर्ज मांग कमजोर

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कई बैंकों के शीर्ष अधिकारियों ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास की बैंकों के कर्ज देने में जोखिम से बचने संबंधी टिप्पणी पर बृहस्पतिवार को असहमति जतायी और उसके जवाब में अपनी बात रखी है।

मुंबई, 27 अगस्त सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कई बैंकों के शीर्ष अधिकारियों ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास की बैंकों के कर्ज देने में जोखिम से बचने संबंधी टिप्पणी पर बृहस्पतिवार को असहमति जतायी और उसके जवाब में अपनी बात रखी है।

दास ने वित्तीय पत्र बिजनेस स्टैण्डर्ड द्वारा आयोजित बेविनार में बृहस्पतिवार को कहा कि बैंकों को जोखिम से बचने की प्रवृति के चलते कर्ज देने से पीछे नहीं हटना चाहिये इसका उन्हें खुद नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने धोखाधड़ी से बचने के लिये व्यवसायों की दिक्कतों का शीघ्रता से पता लगाने का परामर्श भी दिया।

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हालांकि, बैंक अधिकारियों ने कहा कि असली समस्या जोखिम से बचने की प्रवृत्ति नहीं बल्कि कर्ज मांग में कमी की है और इसे सिर्फ सरकार ही दूर कर सकती है।

ये टिप्पणियां ऐसे समय हुई हैं, जब कर्ज वितरण में वृद्धि लगातार सुस्त हो रही है। इसे लेकर कई विश्लेषक ऐसा मान रहे हैं कि महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था में कमजोरी के मद्देनजर संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर चिंतित बैंक कर्ज देने से बच रहे हैं।

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इस सप्ताह की शुरुआत में जारी आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 में धोखाधड़ी दोगुना होकर 1.85 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गयी।

गवर्नर दास के संबोधन के तत्काल बाद सबसे बड़े निजी बैंक एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक (एमडी) एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) आदित्य पुरी ने कहा कि उनके बैंक की ब्याज से आय जून तिमाही में 20 प्रतिशत बढ़ी है, इससे पता चलता है कि उनके बैंक में अच्छे से ऋण वितरण हो रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘जोखिम से बचने की प्रवृत्ति कहीं नहीं है बल्कि यह समझदार बैंकिंग है।

यदि हम पैसे देते हैं तो हम चाहते हैं कि वे हमें वापस मिलें। यदि अभी कोई कर्ज दे देता हो और बाद में कोई कहे कि यह नासमझ बैंकिंग थीं।’’

उन्होंने इसमें जोड़ा, ‘‘जोखिम से बचने की किसी प्रकार की प्रवृत्ति नहीं है। हम ऐसा कैसे हो सकते हैं? क्या आपने नहीं देखा कि जून तिमाही में हमारी आय 20 प्रतिशत बढ़ी है?’’

पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) एमडी एवं सीईओ एसएस मल्लिकार्जुन राव ने कहा, ‘‘मैं स्पष्ट रूप से कह सकता हूं कि जोखिम से बचने की कोई प्रवृत्ति नहीं है। वास्तविक समस्या मांग की कमी है।’’

उन्होंने कहा कि आरबीआई द्वारा 2016 के अंत में कड़े एनपीए मानदंडों को लागू करने के बाद से ऋण की मांग धीमी रही है। दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) ने इसे और धीमा किया है। सिर्फ आईबीसी के माध्यम से चार लाख करोड़ रुपये के ऋणों का निपटान किया गया है। कर्ज की मांग 2016 से ही सुस्त है और महामारी ने इसे समाप्त कर दिया है।

यूनियन बैंक के एमडी एवं सीईओ राजकिरण राय ने कहा, ‘‘मुझे नहीं पता कि जब हम अच्छी परियोजनाओं के लिये धन मुहैया करा रहे हैं, तो हमारे ऊपर जोखिम से बचने का आरोप क्यों लगाया जा रहा है। जब समूचा पारिस्थितिकी तंत्र नदारद है, तो आप हमें कमजोर ऋण मांग के लिये दोषी नहीं ठहरा सकते हैं।’’

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन रजनीश कुमार ने कहा कि ऋण वृद्धि मांग पर निर्भर है। उन्होंने कहा, ‘‘गवर्नर की उस सामान्य धारणा को सबके सामने रख रहे थे कि बैंकिंग क्षेत्र उस तरह से कर्ज नहीं दे रहा है जैसा कि वह पहले देता रहा है। लेकिन समग्र रूप से ऋण की मांग बहुत अधिक नहीं है।’’

उन्होंने इसके लिये खराब निवेश और वर्तमान समग्र ऋण स्थिति को जिम्मेदार बताया।

आईडीबीआई बैंक के एमडी एवं सीईओ राकेश शर्मा ने कहा कि विवेकपूर्ण बैंकिंग का मतलब यह नहीं है कि जोखिम न लें। उन्होंने कहा, "हम कुछ सीमा तक कर्ज दे रहे हैं और मार्च तक अच्छी मांग थी। लेकिन लॉकडाउन के बाद से खुदरा क्षेत्र में कोई मांग नहीं है। मैं बस इतना कह सकता हूं कि हम उचित स्तर पर कर्ज दे रहे हैं और अपने जोखिमों को अच्छी तरह से प्रबंधित कर रहे हैं।"

एक्सिस बैंक के एमडी एवं सीईओ अमिताभ चौधरी ने कहा कि वह एक स्थिर गति से ऋण देने में सहज थे जो कि पहली तिमाही के आंकड़ों में दिखाई देता है, जब ऋण खाता 16 प्रतिशत बढ़ा था। हम जो कर रहे हैं, वह यह सुनिश्चित करते हुए कि सही ग्राहकों से व्यापार प्राप्त हो। हम अपने शेयरधारकों के प्रति भी जवाबदेह हैं।

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