नयी दिल्ली, 31 मई बारिश हो या तपती दोपहरी, आंधी आए या ओले पड़ें या फिर महामारी ही क्यों न फैली हो, महिलाओं का एक समूह तमाम मुश्किलों व चुनौती भरे हालातों के बावजूद भारतीय ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ बन लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराता है। हम बात कर रहे हैं आशा कर्मियों की।
इनका मेहनताना भले कम हो लेकिन मेहनत में कोई कोर-कसर नहीं रखतीं, अधिकतर काम की चर्चा भी नहीं होती लेकिन उससे भी कोई गुरेज नहीं…शायद यही वजह है कि पिछले हफ्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोविड पर नियंत्रण को लेकर इनके प्रयासों के लिये इन्हें सम्मानित किया।
देश की 10 लाख मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) स्वयंसेवकों के लिये डब्ल्यूएचओ की तरफ से मिला यह सम्मान वह वैश्विक मान्यता थी जिसकी उन्हें जरूरत थी। आशा कार्यकर्ता दवाएं, टीके, प्राथमिक चिकित्सा देने के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को स्वास्थ्य सलाह देने के अलावा कई अन्य सेवाएं भी देती हैं।
लेकिन कम भुगतान, सुविधाओं की कमी और अनियमित काम के समय के खिलाफ उनका संघर्ष जारी है। और क्योंकि वे महिलाएं हैं ऐसे में घर और नौकरी दोनों के बीच संतुलन साधना भी उनके लिये अहम है।
उत्तर प्रदेश के बस्ती की एक आशा कार्यकर्ता 42 वर्षीय शैलेंद्री हर सुबह तीन बजे उठती है। जल्दी-जल्दी घर के काम खत्म करती है और फिर घर-घर जाने के लिए अपने सहयोगियों के साथ निकल जाती हैं। हालांकि उनकी प्राथमिक चिंता है कि घर की जरूरतें कैसे पूरी की जाएं।
उन्होंने कहा, “सरकार को हमें एक निश्चित आमदनी देनी चाहिए। बहुत काम है... क्या अधिकारी हमारे द्वारा किए गए काम को देखते हैं? हमने इतनी ईमानदारी से लोगों की सेवा की है, लेकिन केवल खोखली प्रशंसा मिली है।” उन्हें नहीं पता कि उनके जैसी आशा कर्मियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किया गया है।
बस्ती में अपने घर से ‘पीटीआई-’ को फोन पर दिए साक्षात्कार में 16 सालों से आशा कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहीं शैलेंद्री ने कहा, “हमें हर महीने ज्यादा से ज्यादा 10,000 रुपये मिलते हैं। हर दिन कीमतों में बढ़ोतरी के बीच हमसे उस पैसे में अपना काम चलाने की उम्मीद कैसे की जाती है। साथ ही, अपने काम को अपने परिवार से पहले रखकर हम जो व्यक्तिगत त्याग करते हैं... उसे कौन महत्व देता है?”
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