देश की खबरें | अनुच्छेद 370 : जख्मों पर मरहम की जरूरत-न्यायमूर्ति कौल

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला देते हुए सोमवार को 1980 के दशक से अबतक जम्मू-कश्मीर में सरकार और सरकार से इतर तत्वों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच और रिपोर्ट करने के लिए एक ‘निष्पक्ष सत्य - सुलह आयोग’ बनाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा, ‘‘ घावों पर मरहम लगाने की जरूरत है।

नयी दिल्ली, 11 दिसंबर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला देते हुए सोमवार को 1980 के दशक से अबतक जम्मू-कश्मीर में सरकार और सरकार से इतर तत्वों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच और रिपोर्ट करने के लिए एक ‘निष्पक्ष सत्य - सुलह आयोग’ बनाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा, ‘‘ घावों पर मरहम लगाने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति कौल ने पूर्ववर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के केंद्र के फैसले को बरकरार रखते हुए एक अलग, लेकिन सहमति वाला फैसला सुनाया।

जम्मू-कश्मीर के ही मूल रूप से रहने वाले न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि वहां के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने अस्थिर स्थिति के कारण भारी कीमत चुकाई है और अपने जीवन में उन्होंने पहले से ही खंडित समाज पर अंतर-पीढ़ीगत आघात के परिणामों को देखा है।

उन्होंने 121 पन्नों के फैसलों में कहा, ‘‘क्षेत्र के लोगों ने जो सहा है, उसके लिये मैं पीड़ा महसूस किये बिना नहीं रह सकता और इस उपसंहार को लिखने के लिए बाध्य हूं।’’

अशांत क्षेत्र के लोगों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण करने वाली कई रिपोर्ट आई हैं।

न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि सच बोलने का मंच देने से पीड़ितों को अपनी व्यथा सुनाने का अवसर मिलता है... और इससे सुलह का मार्ग प्रशस्त होता है।

उन्होंने कहा कि हालांकि इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के विभिन्न तरीके हैं, लेकिन विश्व स्तर पर सत्य-सुलह आयोग विशेष रूप से प्रभावी रहे हैं।

न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में सत्य-सुलह आयोग रंगभेद के दौरान किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए स्थापित किया गया था और इसने ‘‘पीड़ितों के लिए आदर भाव या भाव विरेचन के साधन के रूप में कार्य किया, और शांति स्थापना को बढ़ावा दिया’’।

उन्होंने कहा कि अतीत में भी कश्मीर घाटी के विभिन्न वर्गों ने एक सत्य- सुलह आयोग के गठन की मांग की है।

न्यायमूर्ति कौल ने कहा, ‘‘ विश्व स्तर पर किए गए प्रयासों और सत्य एवं सुलह के लिए अनुरोधों को देखते हुए, मैं एक निष्पक्ष सत्य - सुलह आयोग के गठन की अनुशंसा करता हूं। आयोग 1980 के दशक से जम्मू और कश्मीर में सरकार और सरकार से इतर तत्वों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच करेगा और रिपोर्ट देगा एवं सुलह के उपायों की सिफारिश करेगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘आगे बढ़ने के लिए घावों पर मरहम लगाना जरूरी है।’’ न्यायमूर्ति ने कहा कि इस आयोग का गठन शीघ्रता से किया जाना चाहिए, ‘स्मृति लोप होने से पहले’यह कवायद समयबद्ध होनी चाहिए।

अपने फैसले में न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि वह इस चुनौती के प्रति सचेत हैं कि ऐसे आयोग की सिफारिश करना अदालत के दायरे से बाहर है।

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