देश की खबरें | अर्चना सोरेंग : पूर्वजों के पारंपरिक ज्ञान से प्रकृति को बचाने की हिमायती

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. ओडिशा के एक छोटे से गांव की खड़िया जनजाति की लड़की अर्चना सोरेंग को चार दिन पहले तक ज्यादा लोग नहीं जानते थे लेकिन अब उन्हें उनके गांव, जिला, राज्य और देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के बहुत से लोग जानते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने उन्हें अपने नए सात सदस्यीय सलाहकार समूह में शामिल करने का निर्णय किया है, जो जलवायु संकट से निपटने के वास्ते जरूरी सलाह और समाधान उपलब्ध कराएगा।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, दो अगस्त ओडिशा के एक छोटे से गांव की खड़िया जनजाति की लड़की अर्चना सोरेंग को चार दिन पहले तक ज्यादा लोग नहीं जानते थे लेकिन अब उन्हें उनके गांव, जिला, राज्य और देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के बहुत से लोग जानते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने उन्हें अपने नए सात सदस्यीय सलाहकार समूह में शामिल करने का निर्णय किया है, जो जलवायु संकट से निपटने के वास्ते जरूरी सलाह और समाधान उपलब्ध कराएगा।

आदिवासी बहुल सुंदरगढ़ जिले के रांची रोड से करीब पांच किलोमीटर के फासले पर स्थित बिहाबंध गांव की रहने वाली अर्चना अपने इस नये दायित्व को लेकर बहुत उत्साहित हैं और उनका मानना है कि हमारे पूर्वजों ने युगों तक प्रकृति और इसकी आबोहवा को बचाए रखा तथा अब उसी पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल करते दुनिया पर मंडराते खतरे को कम किया जा सकता है।

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मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से रेग्युलेटरी गवर्नेंस की पढ़ाई के दौरान अर्चना का रुझान पर्यावरण नियमन से जुड़े विषय की तरफ हुआ क्योंकि इसके पाठ्यक्रम में कुछ ऐसी बातें थीं, जो उन्होंने बचपन में अपने पिता से सीखी थीं।

उनका कहना है, ‘‘मेरे स्वर्गीय पिता ने अपने बुजुर्गों से प्रकृति के संरक्षण का जो सबक सीखा था, वह उन्होंने मुझे भी सिखाया और मुझे लगा कि इस पारंपरिक ज्ञान का प्रसार और संरक्षण होने के साथ ही इसे प्रकृति की धाती को बचाने में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।’’

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ओडिशा के वसुंधरा में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत आजीविका पर काम करने वाले एक अनुसंधान और नीति सलाहकार संगठन में काम करने वाली अर्चना का कहना है कि वह भाग्यशाली हैं कि उन्हें जलवायु संरक्षण के क्षेत्र में विभिन्न स्वदेशी समुदायों के परंपरागत ज्ञान के दस्तावेजीकरण का मौका मिला, जिसका इस्तेमाल वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के संरक्षण के लिए किया जा सकेगा।

अर्चना सोरेंग विश्व के छह अन्य युवा जलवायु कार्यकर्ताओं के साथ उस समूह में शामिल होंगी जो बिगड़ते जलवायु संकट से निपटने के लिए समाधान और सलाह उपलब्ध कराएंगे। समूह के अन्य सदस्यों में सूडान से निसरीन एल्सिम, फीजी से अर्नेस्ट गिब्सन, माल्दोवा से व्लादिस्लाव काइम, अमेरिका से सोफिया कियानी फ्रांस से नाथन मेतेनियर और ब्राजील से पालोमा कोस्ता को शामिल किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र ने एक बयान में सोरेंग को इस समूह में शामिल करने की जानकारी देते हुए बताया कि वह शोध और अनुसंधान में अनुभवी हैं तथा वह स्वदेशी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए काम कर रही हैं।

अर्चना ने सेंट जॉन मेरी वियानी स्कूल कुतरा से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद राउरकेला, हमीरपुर स्थित कारमेल कान्वेंट स्कूल से इंटर किया। पटना वूमेंस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने मुंबई के टीआईएसएस से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की और इस दौरान छात्रसंघ की अध्यक्ष भी रहीं। परिवार की बात करें तो उनके पिता बिजय कुमार सोरेंग का 2017 में कैंसर के कारण निधन हो गया। उनकी मां उषा केरकेटटा सेंट जॉन मेरी वियानी स्कूल में लाइब्रेरियन और खेल शिक्षक हैं।

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