देश की खबरें | आनंद मोहन की रिहाई बिहार में आजमाए जा रहे नए जातीय समीकरण की ओर करती है इशारा : विश्लेषक
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नयी दिल्ली, 29 अप्रैल राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दागी नेता आनंद मोहन सिंह की जेल से रिहाई से जद(यू)-राजद गठबंधन को राजपूत समुदाय का कुछ समर्थन मिल सकता है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में नए जातीय समीकरण उभरने से स्थिति लगातार बदल रही है।
पूर्व सांसद को गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या के मामले में 15 साल तक जेल में रहने के बाद बृहस्पतिवार को सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया। कृष्णैया को 1994 में मुजफ्फरपुर जिले में भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था और घटना के समय आनंद मोहन सिंह भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे।
आनंद मोहन की सजा में छूट से पहले बिहार जेल नियमावली में संशोधन कर ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या में शामिल लोगों की जल्द रिहाई पर लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया गया।
भले ही इस फैसले के लिए बिहार सरकार की आलोचना हुई हो, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस कदम का बचाव किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे सत्तारूढ़ गठबंधन को चुनावी तौर पर फायदा हो सकता है। हालांकि, राज्य में राजनीतिक जुड़ाव से महागठबंधन और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नए जातिगत समीकरणों की तलाश में हैं।
राजनीतिक टिप्पणीकार मणिकांत ठाकुर का कहना है कि यह बिहार में सामुदायिक राजनीति का दूसरा उभार हो सकता है, जहां सभी दल अपने पारंपरिक मतदाताओं के अलावा अन्य समुदायों से समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
ठाकुर ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘आनंद मोहन की रिहाई का असर बिहार की राजनीति पर जरूर पड़ेगा। इस पर राजपूत लॉबी लंबे समय से काम कर रही है। यादव-मुस्लिम गठजोड़ को छोड़कर राजद को कोई अतिरिक्त समर्थन नहीं मिल रहा है। जद (यू) महसूस कर रहा है कि ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियां) के एक वर्ग पर भाजपा ने नियंत्रण बना लिया है। जद (यू) अपने साथ जोड़ने के लिए किसी और वर्ग की तलाश में था। संभवत: राजपूत लॉबी अब जद(यू) की ओर जाएगी।’’
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