जर्मन चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश में एक अमेरिकी भगोड़ा

एक रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि जर्मनी में चुनाव को प्रभावित करने के लिए किस तरह फर्जी खबरों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

एक रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि जर्मनी में चुनाव को प्रभावित करने के लिए किस तरह फर्जी खबरों का इस्तेमाल किया जा रहा है. अमेरिका से रूस भागे एक शख्स को एक बड़ा नेटवर्क चलाने के लिए जिम्मेदार बताया गया है.फर्जी सेक्स स्कैंडल से लेकर नकली म्यूजियम चोरी तक, जर्मनी के अहम चुनाव को प्रभावित करने के लिए फैलाए जा रहे झूठे प्रचार की जड़ें अमेरिका के एक भगोड़े से जुड़ी हैं, जो अब रूस के लिए प्रचार करता है. रिसर्चरों के मुताबिक, यह दुष्प्रचार एआई से बनाई गई दर्जनों जर्मन वेबसाइटों के जरिए किया जा रहा है.

रिसर्चरों ने पता लगाया कि जॉन डूगन नाम का व्यक्ति ऐसी 100 से ज्यादा फर्जी वेबसाइट चला रहा है. ये वेबसाइट जर्मन मीडिया की तरह दिखती हैं और अमेरिका के पिछले चुनाव में इस्तेमाल हुए झूठे प्रचार के तरीके अपना रही हैं. जर्मन गैर-लाभकारी संगठन ‘करेक्टिव' और अमेरिकी वॉचडॉग 'न्यूजगार्ड' की रिसर्च में यह खुलासा हुआ है.

डूगन अमेरिका के फ्लोरिडा में पुलिस अफसर थे जो रूस भाग गए थे. उनके खिलाफ जबरन वसूली समेत कई आरोप थे. अब वह इंटरनेट पर जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी 'एएफडी' के पक्ष में और मुख्यधारा की पार्टियों के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं. खासकर, ग्रीन पार्टी को निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि यह यूक्रेन और नाटो का समर्थन करती है, जो रूस के हितों के खिलाफ माना जाता है.

फर्जी खबरें कैसे फैलाई जा रही हैं?

'न्यूजगार्ड' की विश्लेषक मैकेंजी सडेगी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "डूगन का मामला दिखाता है कि क्रेमलिन अब गैर-रूसी नागरिकों और पश्चिमी देशों के भगोड़ों का इस्तेमाल कर रहा है, ताकि अपना हाथ छुपाकर प्रचार किया जा सके. डूगन वही तरीके जर्मनी में आजमा रहा है, जो उसने अमेरिका में इस्तेमाल किए थे."

डूगन की एक साइट 'ईको डेयर त्साइट' ने झूठा दावा किया कि ग्रीन पार्टी के नेता रॉबर्ट हाबेक ने एक महिला का यौन शोषण किया. सडेगी के मुताबिक, यह वही तरीका है जो डूगन ने अमेरिका में पूर्व उप-राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टिम वाल्ज पर झूठे आरोप लगाने के लिए अपनाया था.

एक और अफवाह यह फैलाई गई कि जर्मनी 19 लाख केन्याई मजदूरों को लाने की योजना बना रहा है. इस दावे से 'एएफडी' की प्रवासी-विरोधी नीतियों को बढ़ावा देने की कोशिश की गई. इस खबर को अफ्रीकी मीडिया में भी फैलाया गया, ताकि इसके रूसी स्रोत को छुपाया जा सके.

एक और झूठी खबर यह फैलाई गई कि बर्लिन के प्रसिद्ध गेमेल्डेगैलरी म्यूजियम से 10 करोड़ यूरो के मूल्य की पेंटिंग्स गायब हो गईं और इसमें ग्रीन पार्टी के नेता रॉबर्ट हाबेक व क्लाउडिया रोथ शामिल हैं. डूगन ने इन आरोपों को खारिज किया है. न्यूजगार्ड पर उन्होंने एक संदेश प्रकाशित किया, "मैं किसी भी रूसी संगठन से जुड़ा नहीं हूं. रूसी सरकार बेकार है, वहां के नौकरशाह किसी काम के नहीं. मुझे नहीं समझ आता कि लोग क्यों सोचते हैं कि मैं उनके लिए काम करता हूं."

डूगन और रूस का लिंक?

डूगन पहले अमेरिकी नौसेना में भी काम कर चुके हैं. वह दावा करते है कि वह रूस की सरकार से उनका लेना-देना नहीं है और वह स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं. लेकिन पश्चिमी जासूसी एजेंसियों और रिसर्चरों का मानना है कि वह 'स्टॉर्म-1516' नाम के रूसी प्रचार ऑपरेशन का हिस्सा हैं.

एक रिसर्च ग्रुप 'ग्नाइडा प्रोजेक्ट' के मुताबिक, "रूस का तरीका यह है कि वे ढेरों नकली मीडिया वेबसाइटें बनाते हैं, जो एआई से बनी खबरों से भरी होती हैं. जब भी जरूरत होती है, वे इनमें से किसी एक को सक्रिय कर प्रचार फैलाते हैं." अमेरिकी मीडिया में छपी यूरोपीय खुफिया रिपोर्टों में डूगन को 'क्रेमलिन का प्रचारक' बताया गया है, जो रूसी सैन्य जासूसी एजेंसी जीआरयू से पैसा और निर्देश लेता है. 'ग्नाइडा प्रोजेक्ट' के एक सदस्य ने समाचार एजेंसी को बताया, "डूगन इस पूरे ऑपरेशन का सिर्फ चेहरा है."

जर्मन सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि रूस और उसके समर्थक चुनाव से पहले चरमपंथी पार्टियों को मजबूत करने और लोकतंत्र पर संदेह बढ़ाने के लिए दुष्प्रचार कर सकते हैं. मीडिया जांच में संकेत मिले हैं कि क्रेमलिन ना सिर्फ 'एएफडी' बल्कि वामपंथी पार्टी 'बीएसडब्ल्यू' को भी समर्थन दे रहे हैं. जर्मनी के गृह मंत्रालय ने इस खतरे से निपटने के लिए एक टास्कफोर्स बनाई है, जो झूठी खबरों, जासूसी, साइबर हमलों और तोड़फोड़ से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय करेगी.

रूस को क्यों चाहिए ऐसी सरकार?

रिसर्चरों का मानना है कि अगर जर्मनी में कोई सरकार बनती है, जो नाटो और यूक्रेन के समर्थन में कमजोर हो और यूरोपीय एकता को लेकर संदेह जताए, तो यह रूस के लिए फायदेमंद होगा. हालांकि, जर्मनी में डूगन का प्रचार उतनी पकड़ नहीं बना पा रहा, जितनी अमेरिका में बना था. अमेरिका में उनकी फैलाई फर्जी खबरें लाखों बार देखी गईं और बड़े नेताओं को निशाना बनाया गया.

सडेगी के मुताबिक, "अमेरिका में डूगन को राजनीतिक माहौल की अच्छी समझ थी, इसलिए उसकी कहानियां लोगों को ज्यादा प्रभावित कर सकीं. लेकिन जर्मनी में उसकी रणनीति बार-बार उजागर हो रही है, जिससे उसका प्रचार नाकाम हो रहा है."

जर्मनी में 23 फरवरी को मतदान होना है. अब तक के सर्वेक्षणों में मध्य-दक्षिणपंथी पार्टी सीडीयू सबसे आगे चल रही है लेकिन एएफडी को अब तक के ऐतिहासिक मतों के साथ बड़ी जीत मिलने का अनुमान है.

वीके/एनआर (एएफपी, डीपीए)

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