सार्वजनिक परिवहन के बगैर निजी कार्यालयों को संचालित होने की इजाजत देना बिना भेदभावपूर्ण: अदालत

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि निजी कार्यालयों को कर्मचारियों की 33 प्रतिशत उपस्थिति के साथ कामकाज करने की इजाजत देने वाली केंद्र सरकार की एक मई की अधिसूचना उन लोगों के साथ भेदभाव है, जिनके पास अपनी गाड़ी नहीं है और लॉकडाउन के दौरान ऐसे लोगों के कार्यस्थल आने-जाने के लिये कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

जमात

नयी दिल्ली, 14 मई दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि निजी कार्यालयों को कर्मचारियों की 33 प्रतिशत उपस्थिति के साथ कामकाज करने की इजाजत देने वाली केंद्र सरकार की एक मई की अधिसूचना उन लोगों के साथ भेदभाव है, जिनके पास अपनी गाड़ी नहीं है और लॉकडाउन के दौरान ऐसे लोगों के कार्यस्थल आने-जाने के लिये कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ और न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार, दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) और दिल्ली मेट्रो को नोटिस जारी कर इस सिलसिले में दायर याचिका पर अपना-अपना रुख बताने को कहा तथा यह टिप्पणी की।

याचिका के जरिये दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन सेवाएं बहाल करने की मांग की गई है।

पीठ ने कहा कि अधिसूचना के चलते, यहां तक कि उच्च न्यायाल में काम का बोझ उन लोगों पर आ पड़ा है जिनके पास निजी वाहन हैं और अन्य लोग काम का बोझ साझा नहीं कर रहे हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘हमने पाया कि प्रतिवादी भारत सरकार की एक मई 2020 की अधिसूचना में निजी कार्यालयों में 33 प्रतिशत कर्मचारियों की उपस्थिति की इजाजत दी गई, लेकिन ऐसे निजी कार्यालयों के कर्मचारियों को कार्य स्थल आने-जाने के लिये कोई व्यवस्था नहीं की गई। इसके चलते इन कार्यालयों के ऐसे कर्मचारी जिनके पास अपना वाहन है, वे काम पर पहुंचे और उनकी आजीविका चलती रही। वहीं, जिनके पास गाड़ी नहीं थी उनसे भेदभाव हुआ।’’

अदालत का यह फैसला बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय के वेबसाइट पर अपलोड किया गया। इसमें कहा गया है, ‘‘हमने अदालत में भी यह पाया कि मौजूदा परिस्थिति में अदालती कामकाज का सारा बोझ उन लोगों के सिर पड़ गया जिनके पास अपने वाहन हैं क्योंकि अन्य लोगों ने काम को साझा नहीं किया।’’

बुधवार को वीडियो कांफ्रेंस से सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार, डीटीसी और डीएमआरसी ने कहा कि वे कोरोना वायरस संक्रमण के और अधिक प्रसार को रोकने के लिये एहतियात के साथ सेवाएं बहाल कर सकते हैं।

केंद्र सरकार ने कहा है कि सार्वजनिक परिवहन के परिचालन पर प्रतिबंध सिर्फ ‘रेड जोन’ में लगाये गये हैं और समाज को भी कुछ जिम्मेदारी निभानी होगी।

पीठ ने कहा कि पूरी दिल्ली ‘रेड जोन’ है और ‘‘हम इस याचिका पर इसलिए सुनवाई कर रहे हैं कि हमारे विचार से इसकी (अधिसूचना की) परिणिति भेदभाव के रूप में हो रही है।’’

यह याचिका कानून के छात्र शीरीष चड्ढा ने दायर की है, जिसने दलील दी कि केंद्र और दिल्ली सरकार ने सरकारी एवं निजी प्रतिष्ठानों को संचालित होने की इजाजत दी तथा कार एवं दोपहिया वाहन के उपयोग की भी इजाजत दी। लेकिन वे भूल गये कि यहां बड़ी संख्या में लोग कार्यस्थल आने-जाने के लिये सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं।

याचिका के जरिये यह भी मांग की गई है कि दिल्ली में आपस में दो गज दूरी के नियम और स्वच्छता के नियमों के अनुपालन के साथ परिचालन की इजाजत दी जाए।

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