देश की खबरें | वाद की पोषणीयता पर निर्णय के चरण में समझौते पर विचार नहीं किया जा सकता: हिंदू पक्ष
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. मथुरा स्थित कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद मामले में सोमवार को हिंदू पक्ष ने दलील दी कि वाद की पोषणीयता को लेकर दायर अर्जी पर निर्णय के चरण में समझौते पर विचार नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केवल कुछ देर सुनवाई के बाद मामले की अगली सुनवाई की तिथि 21 मई, 2024 निश्चित कर दी।
प्रयागराज, 20 मई मथुरा स्थित कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद मामले में सोमवार को हिंदू पक्ष ने दलील दी कि वाद की पोषणीयता को लेकर दायर अर्जी पर निर्णय के चरण में समझौते पर विचार नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केवल कुछ देर सुनवाई के बाद मामले की अगली सुनवाई की तिथि 21 मई, 2024 निश्चित कर दी।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन की अदालत कर रही है।
इससे पूर्व मुस्लिम पक्ष की वकील तसलीमा अजीज अहमदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए कहा था कि उनके पक्ष ने 12 अक्टूबर, 1968 को एक समझौता किया था जिसकी पुष्टि 1974 में निर्णित एक दीवानी वाद में की गई।
एक समझौते को चुनौती देने की समय सीमा तीन वर्ष है, लेकिन वाद 2020 में दायर किया गया। इस तरह से मौजूदा वाद समय सीमा से बाधित है।
अहमदी ने आगे दलील दी थी कि यह वाद शाही ईदगाह मस्जिद के ढांचे को हटाने के बाद कब्जा लेने और मंदिर बहाल करने के लिए दायर किया गया है।
वाद में की गई प्रार्थना दर्शाती है कि वहां मस्जिद का ढांचा मौजूद है और उसका कब्जा प्रबंधन समिति के पास है।
हिंदू पक्ष ने दलील दी थी कि यह संपत्ति एक हजार साल से अधिक समय से भगवान कटरा केशव देव की है और 16वीं शताब्दी में भगवान कृष्ण के जन्मस्थल को ध्वस्त कर ईदगाह के तौर पर एक चबूतरे का निर्माण कराया गया था।
हिंदू पक्ष की ओर से कहा गया था कि वर्ष 1968 में कथित समझौता कुछ और नहीं, बल्कि सुन्नी सेंट्रल बोर्ड और इंतेजामिया कमेटी द्वारा की गई एक धोखाधड़ी है। इसलिए समय सीमा की बाध्यता यहां लागू नहीं होती है।
हिंदू पक्ष की ओर से दलील दी गई थी कि वर्ष 1968 का कथित समझौता वादी के संज्ञान में 2020 में आया और संज्ञान में आने के तीन साल के भीतर यह वाद दायर किया गया है।
इसके अलावा, 12 अक्टूबर, 1968 को हुए समझौते में भगवान पक्षकार नहीं थे और साथ ही समझौता करने वाला श्री कृष्ण जन्म सेवा संस्थान ऐसा किसी तरह का समझौता करने के लिए अधिकृत नहीं था, बल्कि इस संस्थान का काम दैनिक गतिविधियों का संचालन करना था।
हिंदू पक्ष की ओर से कहा गया था कि यह वाद पोषणीय (सुनवाई योग्य) है और गैर पोषणीयता के संबंध में दाखिल आवेदन पर निर्णय साक्ष्यों को देखने के बाद ही किया जा सकता है।
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(The above story first appeared on LatestLY on May 20, 2024 06:46 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

