ताजा खबरें | अभिभाषण चर्चा चार अंतिम रास

बीजद के प्रसन्न आचार्य ने ओडिशा के अक्सर चक्रवात सहित विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होने का जिक्र करते हुए राज्य को विशेष दर्जा या विशेष पैकेज दिए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं के कारण राज्य की अर्थव्यव्स्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

आचार्य ने महिला आरक्षण विधेयक पारित किए जाने की मांग करते हुए कहा कि यह विधेयक 2010 में ही राज्यसभा से पारित हो चुका है और अभी सत्तारूढ़ भाजपा के पास लोकसभा में खासा बहुमत है। ऐसे में उसे लोकसभा में वह विधेयक पारित करने पर जोर देना चाहिए ताकि हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रही महिलाएं और अधिक अधिकारसंपन्न हो सकें।

आचार्य ने 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आंदोलन का जिक्र करते हुए उसमें भाग लेने वाले लोगों को सम्मानित किए जाने की मांग की।

द्रमुक के टी शिवा ने भाजपा नीत सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उसके छह साल के अब तक के कार्यकाल में पेट्रोल व डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हुयी वहीं घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) पर सब्सिडी कम कर दी गयी और गैस की कीमतों में वृद्धि हुयी जिससे आम परिवारों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें जल्दबाजी में लागू किया गया।

शिवा ने कहा कि कोरोना वायरस पर काबू के लिए लागू किए गए लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की समस्याओं पर गौर नहीं किया गया।

टीआरएस सदस्य के केशव राव ने कोरोना वायरस के कारण पिछला साल काफी खराब गुजरा तथा डॉक्टरों सहित कई लोगों की मौत हो गयी। महामारी के कारण बड़े पैमाने पर लोगों का जीवन प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि टीकाकरण की शुरुआत हो चुकी है और इसके लिए सरकार के साथ ही वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं।

सपा के रामगोपाल यादव ने कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि कई किसानों की जान जा चुकी है। लेकिन सरकार ‘बेरहम’ हो गयी है और उस पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार नए कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने की बात कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार इसके लिए राजी है तो उसे उन कानूनों को स्थगित कर नया विधेयक लाना चाहिए और उसे प्रवर समिति में भेजा जाना चाहिए।

जद (यू) के आरसीपी सिंह ने कहा कि चंपारण आंदोलन की तुलना मौजूदा कृषि कानूनों के साथ करना गलत है क्योंकि चंपारण आंदोलन ‘‘तीन कठिया’’ खेती के खिलाफ शुरू हुआ था जिसमें किसानों को अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी होती है लेकिन इन कानूनों में सरकार की ओर से ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।

उन्होंने कुछ साल पहले तक उत्तर प्रदेश और बिहार की मंडियों की स्थिति का जिक्र करते हुए दावा किया कि वहां व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार था और नियुक्तियों के लिए बड़ी संख्या में सिफारिशें आती थीं।

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