देश की खबरें | ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ के लिए बैंक की सेवाएं लेने वाला व्यक्ति उपभोक्ता नहीं : उच्चतम न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ के लिए बैंक की सेवाओं का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ता नहीं है।

नयी दिल्ली, 23 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ के लिए बैंक की सेवाओं का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ता नहीं है।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता के दायरे में आने के लिए एक व्यक्ति को यह स्थापित करना होगा कि सेवाओं का इस्तेमाल केवल स्वरोजगार के माध्यम से आजीविका कमाने के लिए किया गया था।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने कहा कि इसका कोई सीधा-सपाट फॉर्मूला नहीं हो सकता है और इस तरह का निर्धारण प्रत्येक मामले में रखे गए सबूतों के आधार पर करना होगा।

पीठ ने कहा, ‘जब कोई व्यक्ति उक्त अधिनियम में परिभाषित ‘उपभोक्ता’ शब्द के दायरे में आने के लिए व्यावसायिक उद्देश्य से सेवा का इस्तेमाल करता है, तब उसे यह स्थापित करना होगा कि सेवाओं का इस्तेमाल केवल स्वरोजगार के माध्यम से आजीविका कमाने के मकसद से किया गया था।’

शीर्ष अदालत ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम-2002 स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वाणिज्यिक लेन-देन को उक्त अधिनियम के दायरे से बाहर रखना विधायी मंशा है।

अदालत ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य उस व्यक्ति को लाभ देना भी है, जो ऐसे वाणिज्यिक लेन-देन का हिस्सा तब बनता है, जब वह इन वस्तुओं और सेवाओं का इस्तेमाल केवल स्वरोजगार के माध्यम से अपनी आजीविका कमाने लिए करता है।

शीर्ष अदालत श्रीकांत जी मंत्री घर की याचिका पर यह फैसला सुनाया जिसमें राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

एनसीडीआरसी ने अपने आदेश में कहा था कि शिकायतकर्ता उपभोक्ता नहीं है, जैसा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 की धारा 2(1)(डी) के तहत परिकल्पित है।

याचिकाकर्ता, जो एक स्टॉक ब्रोकर है, ने पंजाब नेशनल बैंक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसने उसे ओवरड्राफ्ट की सुविधा दी थी।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच संबंध विशुद्ध रूप से ‘वाणिज्य से वाणिज्य’ का संबंध हैं।

पीठ ने मंगलवार को दिए अपने फैसले में कहा कि इस तरह, यह लेन-देन स्पष्ट रूप से ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ के दायरे में आएगा।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में यह नहीं कहा जा सकता है कि सेवाओं का इस्तेमाल ‘खासतौर पर स्वरोजगार के माध्यम से आजीविका कमाने के मकसद से’ किया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘अगर याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली व्याख्या को स्वीकार किया जाता है तो ‘वाणिज्य से वाणिज्य’ विवादों को भी उपभोक्ता विवाद के रूप में माना जाएगा, जिससे उपभोक्ता विवाद के त्वरित और सरल निस्तारण का उद्देश्य ही नाकाम हो जाएगा।’

पीठ ने कहा, ‘‘लिहाजा हमें आयोग के फैसले में कोई त्रुटि नहीं दिखती है। बहरहाल, आयोग ने पहले ही याचिकाकर्ता को अधिकार क्षेत्र वाले उपयुक्त फोरम में जाकर अपना समाधान तलाशने की आजादी दे दी है। ऐसे में, याचिका खारिज की जाती है।’’

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