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एक मशहूर डांसर जिसे जासूसी के आरोप में मिली मौत की सजा

अपनी खूबसूरती और डांस के लिए पूरे यूरोप में मशहूर, माता हारी पर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जासूसी का आरोप लगा और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई.

एक मशहूर डांसर जिसे जासूसी के आरोप में मिली मौत की सजा
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

अपनी खूबसूरती और डांस के लिए पूरे यूरोप में मशहूर, माता हारी पर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जासूसी का आरोप लगा और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई.माता हारी अपने समय में एक बहुत बड़ा नाम थी. 1905 में जब पहली बार उन्होंने पेरिस के मंच पर कदम रखा, तो उनकी खूबसूरती और डांस ने पल भर में वहां के अमीरों को उनका दीवाना बना दिया.

उस दौर के पेरिस के अखबारों ने लिखा, "वह घूंघट डाले, बस एक कीमती हीरों से जड़ा ब्लाउज पहनकर डांस करती हैं और लगभग कुछ भी नहीं पहनतीं.” उन्होंने आगे लिखा, "देवताओं के सामने इस तरह बेझिझक खुद को पेश करने की हिम्मत पहले किसी ने नहीं की है. उनका नृत्य शानदार है, जिसमें बेबाकी और शालीनता दोनों नजर आती है.”

भारतीय होने का झूठा दावा

माता हारी ने अपने हुलिये से दर्शकों और अखबारों, दोनों को यह यकीन दिला दिया था कि वह किसी रहस्यमय मंदिर की एक देवदासी हैं. लेकिन सच कुछ और ही था. काले बालों वाली माता हारी असल में नीदरलैंड्स की रहने वाली थीं.

‘बेल एपोक दौर' में पेरिस के लोगों को दूसरी संस्कृतियों, खासकर विदेशी और रहस्यमय दिखने वालों में काफी दिलचस्पी हुई करती थी. पैसों की तंगी के चलते माता हारी ने इस दिलचस्पी का फायदा उठाया और खुद को बतौर भारतीय पेश करना शुरू कर दिया. लोगों का ध्यान खींचने के लिए उन्होंने अपने बारे में एक मनगढ़ंत कहानी भी गढ़ दी कि वह एक उच्च श्रेणी ब्राह्मण की बेटी हैं.

उनका दावा था, "मेरी मां रंगनाथस्वामी मंदिर की मुख्य नृत्यांगना थी. जिस दिन मेरा जन्म हुआ, उसी दिन 14 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई. मंदिर के पुजारियों ने उनका अंतिम संस्कार किया और फिर मुझे अपना लिया. उन्होंने मेरा नाम माता हारी रखा, जिसका मतलब है ‘सूरज की आंख.'”

मलय भाषा में माता का मतलब 'आंख' और हारी का मतलब 'दिन' होता है

माता हारी का दावा था कि उन्होंने बचपन से ही मंदिर में होने वाले पवित्र नृत्य को सीखा था. अपने कार्यक्रमों में वह एक के बाद एक घूंघट उतारती जाती थीं. बाद में उन्होंने खुद माना, "मैं कभी अच्छी नृत्यांगना नहीं थी. लोग मुझे देखने सिर्फ इसलिए आते थे क्योंकि मैं पहली ऐसी महिला थी, जिसने लोगों के सामने बिना कपड़ों के आने की हिम्मत की थी.”

टोपी बनाने वाले की बेटी से माता हारी तक का सफर

पेरिस के आम से लेकर खास, सब लोग माता हारी के दीवाने थे लेकिन बहुत कम लोग जानते थे कि उनका असली नाम मार्गरेटा गीरट्रुइडा जेले था. वह नीदरलैंड्स के छोटे से शहर लीवार्डेन से आई थी.

7 अगस्त 1876 को जन्मी मार्गरेटा के पिता टोपी बनाने का काम करते थे. लेकिन शेयर बाजार से उन्होंने काफी पैसा कमा लिया था. उनके पिता अक्सर उन्हें काफी महंगे तोहफे दिया करते थे. जब वह छह साल की हुईं, तो उन्हें जन्मदिन के तोहफे में एक गाड़ी मिली जिसे बकरियां खींचती थीं.

3 साल की होते ही उनकी जिंदगी के सारे सुख छिन गए. उनके पिता दिवालिया हो गए और परिवार को छोड़ दिया. दो साल बाद, उनकी मां का भी देहांत हो गया. इसके बाद वह अपनी रिश्तेदारों के साथ रहने लगी. इस बीच एक अखबार के विज्ञापन के चलते उनकी मुलाकात उनके होने वाले पति से हुई. विज्ञापन में लिखा था,"डच ईस्ट इंडीज (इंडोनेशिया) का एक अधिकारी शादी के लिए एक सुंदर, सुशील महिला की तलाश में है. महिला की आर्थिक स्थिति मायने नहीं रखती.”

जल्दी ही माता हारी और जॉन रुडोल्फ मैक्लियोड एक-दूसरे के करीब आ गए. मैक्लियोड माता हारी से लगभग 20 साल बड़े थे. साल 1897 में माता हारी अपने पति के साथ डच ईस्ट इंडीज (इंडोनेशिया) चली गई, लेकिन जिस खुशहाल जिंदगी का सपना सजाकर वह वहां पहुंची थी, वह कभी सच नहीं हो सका. दोनों के बीच झगड़े होने लगे और उनके रिश्ते में तनाव बढ़ता चला गया.

इस बीच उनके दो साल के बेटे की भी जहर दिए जाने के कारण मौत हो गई. 1902 में यूरोप लौटने के बाद उनकी शादी टूट गई. मैक्लियोड ने माता हारी को छोड़ दिया और उनकी बेटी को भी अपने साथ ले गया. माता हारी के पास अपने गुजर बसर के भी पैसे नहीं थे.

पेरिस में माता हारी ने अपनी जिंदगी की एक नई शुरुआत की. . लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी, जब उन्होंने ‘माता हारी' नाम की एक रहस्यमय और विदेशी नृत्यांगना की छवि तैयार की. उन्होंने यूरोप के कई बड़े शहरों में शानदार कार्यक्रम किए. आलीशान होटलों में ठहरीं और बड़े-बड़े लोगों की महफिलों में नाचीं. उन्होंने जर्मन सम्राट विल्हेम द्वितीय के बेटे के लिए भी अपना नृत्य दिखाया. अपनी बढ़ती लोकप्रियता के चलते माता हारी यूरोप के प्रभावशाली लोगों के बीच पहुंची. राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों से उनके करीबी संबंध बने, जो उनके समय के लिए उन्हें अच्छी-खासी रकम देते थे.

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बढ़ी आर्थिक तंगी

समय के साथ माता हारी की लोकप्रियता घटने लगी. कई युवा नर्तकियों ने उनके स्टाइल की नकल करना शुरू कर दिया. पेरिस के दर्शक भी अब किसी नई चीज की तलाश में आगे बढ़ चुके थे. साल 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, माता हारी के लिए अपनी आलीशान जिंदगी को बनाए रखना मुश्किल हो गया.

अपना कर्ज चुकाने के लिए माता हारी ने नीदरलैंड्स में जर्मनी के कौंसुल का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. उन्हें वादा किया गया कि अगर वह युद्ध में जर्मनी के विरोधी पक्ष से खुफिया जानकारी जुटाती हैं, तो उन्हें इसके बदले अच्छी-खासी रकम दी जाएगी. शुरुआत में ही उन्हें 20,000 फ्रैंक दिए गए, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी. यहीं से सफर शुरू हुआ ‘एजेंट एच-21' का.

जब फ्रांसीसी खुफिया एजेंसियों ने माता हारी से संपर्क किया और उन्हें और ज्यादा पैसे देने की पेशकश की गई, तो वह डबल एजेंट बन गईं. हालांकि, यहां उनसे एक बड़ी गलती हो गई. फ्रांसीसी खुफिया एजेंसी ने उनको टारगेट किया ताकि वह जर्मनी के लिए जासूसी करते हुए पकड़ी जा सकें. दूसरी तरफ, यूरोप में उनकी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश खुफिया एजेंसी भी उनपर नजर रख रही थी. आखिरकार 13 फरवरी 1917 को माता हारी को गिरफ्तार कर लिया गया.

41 साल की माता हारी को देशद्रोह का आरोप में 15 अक्टूबर 1917 को पेरिस के पास बने एक किले की खाई में गोली मार दी गई. वहां मौजूद लोगों की मानें तो माता हारी गोली चलाने वाले 12 सैनिकों के ग्रुप के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी रही, बल्कि उन्हें एक फ्लाइंग किस भी दी. उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधने से इनकार कर दिया और गोली चलाने का आदेश देने वाले अधिकारी की ओर देखते हुए कहा, "धन्यवाद, महोदय.”

माता हारी की एक चालाक जासूस वाली छवि पर आज भी सवाल उठते हैं. ब्रिटिश खुफिया विभाग ने कई दशकों तक कुछ दस्तावेज गोपनीय रखे थे. इन दस्तावेजों के मुताबिक, माता हारी ने अगर कोई खुफिया जानकारी दी भी थी, तो उससे प्रथम विश्व युद्ध पर कुछ खास असर नहीं पड़ा था.

इन सब बातों से लगता है कि उस समय फ्रांसीसी सेना को किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश थी, जिसे युद्ध की नाकामी का जिम्मेदार ठहराया जा सके. माता हारी ने अपनी आखिरी सांस तक जासूसी करने के आरोप से इनकार किया. वह सच में जासूस थीं या नहीं, यह आज भी पूरी तरह साफ नहीं है.

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 11, 2026 07:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).