देश की खबरें | भारतीय बच्ची की वतन वापसी के लिए 19 दलों के 59 सांसदों ने जर्मन राजदूत को लिखा पत्र
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नयी दिल्ली, तीन जून भारत के 19 राजनीतिक दलों के 59 सांसदों ने जर्मन राजदूत को पत्र लिखकर उस भारतीय बच्ची की वतन वापसी सुनिश्चित करने में हस्तक्षेप करने की मांग की है, जिसे जर्मन अधिकारियों ने सितंबर 2021 में उसके अभिभावकों से दूर कर दिया था।
जर्मनी की बाल कल्याण एजेंसी ‘युगेनतम्त’ ने अरिहा शाह के माता-पिता पर बच्ची को प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए उसकी देखभाल की जिम्मेदारी (कस्टडी) अपने हाथों में ले ली थी। उस समय अरिहा महज सात महीने की थी।
भारतीय सांसदों ने जर्मन राजदूत को लिखे पत्र में कहा है, “हम आपके देश की किसी भी एजेंसी पर आक्षेप नहीं लगा रहे हैं। हम यह मान रहे हैं कि उस वक्त जो कुछ भी किया गया था, उसे बच्ची के लिए सबसे ज्यादा हितकर माना गया था।”
सांसदों ने लिखा है, “हम आपके देश की कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं, लेकिन चूंकि, उक्त परिवार के किसी भी सदस्य के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है, इसलिए समय आ गया है कि बच्ची को स्वदेश भेज दिया जाए।”
विभिन्न दलों के सांसदों ने इस पत्र का समर्थन किया है। इनमें हेमा मालिनी (भारतीय जनता पार्टी), अधीर रंजन चौधरी (कांग्रेस), सुप्रिया सुले (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी), कनिमोई करुणानिधि (द्रविड़ मुनेत्र कषगम), महुआ मोइत्रा (तृणमूल कांग्रेस), अगाथा संगमा (नेशनल पीपुल्स पार्टी), हरसिमरत कौर बादल (शिरोमणि अकाली दल), मेनका गांधी (भाजपा), प्रणीत कौर (कांग्रेस), शशि थरूर (कांग्रेस) और फारूक अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस) शामिल हैं।
सांसदों ने कहा कि अरिहा के अभिभावक धरा और भावेश शाह बर्लिन में थे, क्योंकि उसके पिता वहां की एक कंपनी में कार्यरत थे। उन्होंने कहा कि परिवार को अब तक भारत लौट आना चाहिए थे, लेकिन कुछ दर्दनाक घटनाक्रमों की वजह से ऐसा नहीं हो सका।
‘युगेनतम्त’ ने अरिहा के माता-पिता से उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उस समय अपने हाथों में ले ली थी, जब मूलाधार (किडनी और अंडाशय के बीच का हिस्सा) में चोट लगने के कारण उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था।
पत्र में कहा गया है कि अभिभावकों के खिलाफ बाल यौन शोषण के आरोपों में जांच शुरू की गई थी और फरवरी 2022 में उन पर कोई आरोप लगाए बिना मामला बंद कर दिया गया था। इसमें कहा गया है कि अस्पताल ने भी अपनी रिपोर्ट में बच्ची के यौन शोषण से इनकार किया था।
सांसदों ने कहा, “इन सबके बावजूद बच्ची को उसके माता-पिता को नहीं लौटाया गया और ‘युगेनतम्त’ ने उसकी स्थायी अभिरक्षा (कस्टडी) के लिए जर्मनी की अदालतों का रुख कर दिया। ‘युगेनतम्त’ का कहना है कि भारतीय अभिभावक अपने ही बच्ची की देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं और बच्ची जर्मन पालकों की देखरेख में ज्यादा अच्छे से रहेगी।”
सांसदों ने कहा कि अदालत की ओर से नियुक्त मनोवैज्ञानिक द्वारा माता-पिता के मूल्यांकन के चलते मामला डेढ़ साल से अधिक समय तक खिंच गया है।
उन्होंने कहा, “बच्ची को एक देखभालकर्ता से दूसरे के पास स्थानांतरित करने से उसे गहरा आघात लगेगा। माता-पिता को केवल हर 15 दिनों पर उससे की अनुमति है। इन मुलाकातों के वीडियो दिल दुखा देने वाले हैं और ये बच्ची के अपने माता-पिता के साथ गहरे लगाव और अलगाव के दर्द को जाहिर करते हैं।”
सांसदों ने कहा, “एक और पहलू है। हमारे अपने सांस्कृतिक मानदंड हैं। बच्ची एक जैन परिवार से ताल्लुक रखी है, जो पूर्ण शाकाहारी है। बच्ची को विदेशी संस्कृति में पाला जा रहा है, उसे मांसाहारी खाना खिलाया जा रहा है। यहां भारत में होने के नाते, आप इस बात को बेहतर समझ सकते हैं कि यह हमारे लिए कितना अस्वीकार्य है।”
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