विदेश की खबरें | संयुक्त राष्ट्र जलवायु कूटनीति के 50 वर्ष: एक सिंहावलोकन

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. ग्रेटर बोस्टन (अमेरिका), एक जून (द कन्वरसेशन) वर्ष 1972 में एसिड वर्षा से पेड़ नष्ट हो रहे थे, डीडीटी के जहर से पक्षियों की मौत हो रही थी, कई देश तेल के रिसाव से उत्पन्न संकट, नाभिकीय अस्त्रों के परीक्षण तथा वियतनाम युद्ध के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान से जूझ रहे थे। उस दौर में वायु प्रदूषण का स्तर सीमा से बाहर होता जा रहा था। तब, स्वीडन के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र ने दुनियाभर के देशों के प्रतिनिधियों को एकजुट कर समाधान निकालने का प्रयास किया।

ग्रेटर बोस्टन (अमेरिका), एक जून (द कन्वरसेशन) वर्ष 1972 में एसिड वर्षा से पेड़ नष्ट हो रहे थे, डीडीटी के जहर से पक्षियों की मौत हो रही थी, कई देश तेल के रिसाव से उत्पन्न संकट, नाभिकीय अस्त्रों के परीक्षण तथा वियतनाम युद्ध के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान से जूझ रहे थे। उस दौर में वायु प्रदूषण का स्तर सीमा से बाहर होता जा रहा था। तब, स्वीडन के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र ने दुनियाभर के देशों के प्रतिनिधियों को एकजुट कर समाधान निकालने का प्रयास किया।

पचास साल पहले 1972 में पांच से 16 जून के बीच स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन में पहली बार पर्यावरण को एक वैश्विक नीति का मुद्दा बनाया गया और उसके प्रबंधन के लिए मूल सिद्धांत परिभाषित किये गए। दुनिया के देश प्रकृति और हवा जैसे संसाधनों के बारे में कैसे सोचते हैं इस पर स्टॉकहोम सम्मेलन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

इस सम्मेलन के बाद, पर्यावरण की स्थिति की निगरानी और उससे जुड़ी समस्याओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) तैयार किया गया। स्टॉकहोम सम्मेलन की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर, आइये हम देखते हैं कि आधी सदी में पर्यावरण कूटनीति कहां तक पहुंची है। कूटनीति के परिप्रेक्ष्य में, स्टॉकहोम सम्मेलन एक बड़ी उपलब्धि थी।

इसने राज्य की संप्रभुता पर आधारित संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की सीमाओं के बंधन को तोड़ा और साझा हित के लिए संयुक्त कार्य करने के महत्व को रेखांकित किया। इस सम्मेलन में 113 देशों के प्रतिनिधि और संरा की एजेंसियों के अधिकारी भी शामिल हुए थे तथा उन्होंने गैर सरकारी व्यक्तियों और संगठनों को भी पर्यावरण की वकालत करने वालों के तौर पर शामिल किया।

इसमें एक घोषणा की गई जिसमें वैश्विक पर्यावरण प्रबंधन को आगे ले जाने वाले सिद्धांत शामिल थे। घोषणा में कहा गया कि राज्यों (देशों) के पास “अपने संसाधनों का इस्तेमाल करने का संप्रभु अधिकार है और वे अपने अधिकार क्षेत्र और नियंत्रण में की गई गतिविधि की जिम्मेदारी लेंगे ताकि अन्य राज्यों या राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र की सीमा से परे जाकर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।”

इसके तहत एक कार्ययोजना तैयार की गई और यूएनईपी को पर्यावरण के लिए एक वैश्विक संस्था के रूप में स्थापित किया गया। इसके बीस साल बाद 1992 में रियो डी जेनेरो में संरा पर्यावरण और विकास सम्मेलन या ‘अर्थ समिट’ का आयोजन किया गया।

इस सम्मेलन में सतत विकास की अवधारणा प्रस्तुत की गई जिसका अर्थ था ऐसा विकास करना जिससे भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इससे कई स्तर पर राजनीतिक सहमति बनाने में मदद मिली।

पहला, जलवायु परिवर्तन से यह स्पष्ट हो गया कि मानव की गतिविधियों से धरती की व्यवस्था में स्थायी परिवर्तन संभव है इसलिए सभी को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। दूसरा, आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास एक दूसरे पर निर्भर हैं यह स्वीकार किया गया। तीसरी सहमति इस बात पर बनी कि सभी देश सतत विकास को जारी रख सकते हैं लेकिन विकसित देशों के पास ऐसा करने की क्षमता अधिक है और उनके समाज से पर्यावरण पर अधिक दबाव बनता है।

पिछले 50 वर्षों में पर्यावरण की चुनौतियों के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण राष्ट्रीय पर्यावरण एजेंसियों और वैश्विक पर्यावरण कानून को बढ़ावा मिला है।

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