एक मई से शुरू श्रमिक विशेष रेलगाड़ियों में अबतक 30 बच्चों ने जन्म लिया

इससे तमाम परेशानियों का सामना कर घर लौट रहे प्रवासी कामगारों को कुछ खुशी के पल मिले हैं। चाहे 23 वर्षीय संगीता हो या 27 वर्षीय मधु। लॉकडाउन की वजह से वे दो महीने से फंसी थीं और गर्भावस्था में जरूरी सुविधाएं तो दूर अक्सर बिना खाना-पानी के भी रहना पड़ा और श्रमिक विशेष रेलगाड़ी में सवार होने के बाद उन्होंने राहत की सांस ली। इसी पल उनके अजन्मे बच्चों ने भी दुनिया में सुरक्षित कदम रखने का फैसला किया।

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नयी दिल्ली, 24 मई कोरोना वायरस पर काबू के लिए लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की वजह से देश के विभिन्न राज्यों में फंसे प्रवासियों को उनके गृह प्रदेशों तक पहुंचाने के लिए एक मई से शुरू श्रमिक विशेष रेलगाड़ियों में अबतक 30 बच्चों का जन्म हुआ है।

इससे तमाम परेशानियों का सामना कर घर लौट रहे प्रवासी कामगारों को कुछ खुशी के पल मिले हैं। चाहे 23 वर्षीय संगीता हो या 27 वर्षीय मधु। लॉकडाउन की वजह से वे दो महीने से फंसी थीं और गर्भावस्था में जरूरी सुविधाएं तो दूर अक्सर बिना खाना-पानी के भी रहना पड़ा और श्रमिक विशेष रेलगाड़ी में सवार होने के बाद उन्होंने राहत की सांस ली। इसी पल उनके अजन्मे बच्चों ने भी दुनिया में सुरक्षित कदम रखने का फैसला किया।

पिछले सोमवार को नौ महीने के गर्भ के साथ संगीता बेंगलुरु से उत्तर प्रदेश स्थित अपने घर लौटने के लिए श्रमिक विशेष रेलगाड़ी में सवार हुई थी। यात्रा के दौरान उन्होंने रेलगाड़ी में ही सह-यात्रियों की मदद से बेटे को जन्म दिया।

इसके ठीक बाद उन्हें दवाएं उपलब्ध कराई गईं और जब वह पहुंची तो चिकित्सकों की टीम पहले से वहां मौजूद थी। बेंगलुरु पुलिस ने दंपति द्वारा बच्चे की भेजी गई तस्वीर भी साझा की।

गत शुक्रवार को 27 वर्षीय मधु कुमारी ने भी उत्तर प्रदेश स्थित घर लौटने के दौरान ही बच्चे को जन्म दिया। जब उन्हें प्रसव पीड़ा हुई तब रेलगाड़ी में सवार रेलवे कर्मचारियों ने इसकी सूचना रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) को दी।

बच्चे का जन्म रेलगाड़ी के झांसी रेलवे स्टेशन पहुंचने से पहले ही हो गया। हालांकि, स्टेशन पर मधु को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई।

रेलवे के प्रवक्ता आरडी बाजपेयी ने बताया, ‘‘ हमें इसका भान है कि हमारे कर्मचारी परिस्थिति के हिसाब से कार्य करते हैं और उन्होंने ऐसा किया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमें गर्व है कि इन रेलगाड़ियों में पैदा होने वाले सभी बच्चे स्वस्थ्य हैं और उनकी मां भी ठीक हैं। हम इस बात से खुश हैं कि हम उनकी मदद कर सके।’’

हालांकि, इन विशेष रेलगाड़ियों में बच्चे के जन्म की पहली घटना आठ मई को हुई जब गुजरात से अकेले बिहार जा रही ममता यादव ने बच्चे को जन्म दिया।

अधिकारियों ने बताया कि रेलगाड़ी जामनगर से रात आठ बजे रवाना हुई और 35 वर्षीय ममता को मध्य रात्रि में प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। डिब्बे के उस कूपे के यात्री बाहर चले गए और उस जगह को प्रसव कक्ष में तब्दील कर दिया गया।

उन्होंने बताया, ‘‘चिकित्सकों और रेलवे कर्मचारियों ने ममता की मदद की और उन्होंने स्वस्थ्य बेटी को जन्म दिया। उन्हीं यात्रियों में से किसी ने तुरंत बच्ची का नाम ‘कोरोना कुमारी’ रख दिया।’’

बाजपेयी ने कहा, ‘‘चिकित्सा आपातस्थिति से निपटने के लिए हमारे पास एक प्रणाली है।’’

रेलवे के प्रवक्ता ने कहा कि जब भी यात्रियों को मदद की जरूरत होती है तब रेलगाड़ी में सवार कर्मचारी स्टेशन को इसकी सूचना देते हैं और वहां के रेलवे कॉलोनी में रहने वाले चिकित्सक यात्री की मदद के लिए तत्काल स्टेशन पर पहुंच जाते हैं।

इसी प्रकार 13 मई को पिंकी यादव ने अहमदाबाद-फैजाबाद श्रमिक विशेष रेलगाड़ी में आरपीएफ कर्मियों की मदद से बेटे को जन्म दिया।

उन्हें उत्तर प्रदेश के कानपुर रेलवे स्टेशन पर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई लेकिन आगे के इलाज के लिए जिला अस्पताल रेफर करने की जरूरत पड़ी।

रेलवे के मुताबिक 23 वर्षीय ईश्वरी देवी ने हबीबगंज-बिलासपुर श्रमिक विशेष रेलगाड़ी में गत रविवार को कर्मचारियों और महिला यात्रियों की मदद से बेटे को जन्म दिया।

रेलवे ने ईश्वरी को न केवल जरूरी दवाएं मुहैया कराई बल्कि इलाज की जरूरत होने पर छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराने की भी व्यवस्था की।

रेलवे ने अबतक करीब 2,800 श्रमिक विशेष रेलगाड़ियों का परिचालन किया है और इनमें बच्चों के जन्म से रोजमर्रा के तनाव से कुछ सुकून के पल मिले हैं।

चूंकि इन बच्चों का जन्म अंजान लोगों के बीच हुआ। इसलिए पहली बार रोने की उनकी आवाज रेलगाड़ी पर सवार कई लोगों ने सुनी।

रविवार को उत्तर प्रदेश आने वाली विशेष रेलगाड़ी में जन्म लेने वाली एक बच्ची का नाम ‘ लॉकडाउन यादव’ रखा गया है।

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