घर के कामों की दोहरी मार से बिगड़ रहा महिलाओं का स्वास्थ्य
भले ही महिलाओं में आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है, लेकिन घर के कामकाज का ज्यादा बोझ अब भी उन्हीं के कंधों पर दिखता है.
भले ही महिलाओं में आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है, लेकिन घर के कामकाज का ज्यादा बोझ अब भी उन्हीं के कंधों पर दिखता है. रिसर्च की मानें तो यह बोझ महिलाओं को शारीरिक ही नहीं, कई तरह के मानसिक कष्ट और बीमारियां दे रहा है.यह तो हम सब देखते आए हैं कि औरतें घर में ज्यादा काम करती हैं. वे खाना बनाने, सफाई करने, घर संभालने और बच्चों की देखभाल करने में पुरुषों से कहीं ज्यादा समय बिताती हैं.
पिछले 20 वर्षों में हुए कई रिसर्च के नतीजे दिखाते हैं कि घर के कामकाज और मानसिक जिम्मेदारी का ज्यादातर बोझ उठाने वाली महिलाओं की सेहत और खुशहाली पर इसका साफ असर पड़ता है.
अच्छी सेहत का आधार है शादी - लेकिन किसकी?
किसी महिला और पुरुष के बीच की शादी को अक्सर स्थिरता और अच्छी सेहत का आधार माना जाता है. हालांकि, कुछ अध्ययनों से पता चला है कि शादी से मिलने वाले ये फायदे दोनों के लिए एक जैसे नहीं होते. ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि दोनों के बीच तालमेल कैसा है. क्या घर की जिम्मेदारियां बराबरी से बंटी हैं और वे एक-दूसरे की मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को कितना समझते हैं.
थाईलैंड में रहने वाली 40 साल की एनी ने बताया, "इस बारे में बात करना बेहद जरूरी है कि घर के कामों और देखभाल की जिम्मेदारियों में महिलाएं कितना 'अदृश्य' और भावनात्मक बोझ उठाती हैं. हमें इस पर चर्चा करनी चाहिए कि घर संभालने और अपनों का ख्याल रखने में महिलाओं को कितनी दिमागी और भावनात्मक मेहनत करनी पड़ती है, जो किसी को दिखाई नहीं देती. इस 'मानसिक बोझ' को अक्सर लोग समझ नहीं पाते और न ही इसकी सराहना करते हैं.”
साइकोथेरेपिस्ट बेन यालोम ने इंसानी रिश्तों की मुश्किलों के बारे में काफी लिखा है. उनके पिता इरविन यालोम एक साइकियाट्रिस्ट हैं और उन्होंने भी इस विषय पर बहुत कुछ लिखा है. यालोम इस बात पर जोर देती है कि घर के ज्यादातर काम महिलाओं के जिम्मे इसलिए आते हैं क्योंकि हमारी संस्कृति और परंपराएं ऐसी हैं, न कि इसलिए कि महिलाओं में किसी तरह की कोई कमी होती है.
बेन यालोम कहती हैं, "स्त्री-पुरुष के कामों में यह जो फर्क दिखता है, वह काफी हद तक हमारे पालन-पोषण का नतीजा है. लड़कों को बचपन से ही अनजाने में 'मर्द' बनने की एक ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है, जिसे हम समझ भी नहीं पाते कि उससे हमारा व्यवहार कैसे प्रभावित हो रहा है.”
यालोम ने आगे बताया कि महिलाओं को बचपन से ही सबकी देखभाल करने और दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने की ट्रेनिंग दी जाती है. इस वजह से पुरुष न तो वैसी जिम्मेदारी उठाना सीखते हैं और न ही कोशिश करते हैं. यही असली समस्या है.
घरेलू कामों का मानसिक बोझ
भले ही पति-पत्नी या दोनों पार्टनर काम करते हों, लेकिन ज्यादातर मानसिक बोझ महिलाएं ही उठाती हैं. शोधकर्ता इसे एक ऐसी 'छिपी हुई मेहनत' मानते हैं जिसके बिना घर नहीं चल सकता. जैसे, इस बात का ध्यान रखना कि किसे कब कहां जाना है, यह सोचना कि रोज क्या खाना बनेगा और घर के हर छोटे-बड़े काम को व्यवस्थित करना.
स्वीडन के एक शोध में 14,184 लोगों को शामिल किया गया. इसमें यह बात सामने आई कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं घर के 'बिना पगार वाले' कामों पर लगभग दोगुना समय बिताती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जहां हर 20 में से सिर्फ 1 पुरुष हफ्ते में 30 घंटे से ज्यादा घरेलू काम करता है. वहीं, हर 10 में से 1 महिला इतना समय घर के कामों को देती है.
अध्ययन में यह भी पाया गया कि महिलाओं में डिप्रेशन (अवसाद) के लक्षण दिखने या डिप्रेशन होने की संभावना काफी ज्यादा थी. घर के कामकाज के इस भारी बोझ और तनाव को डिप्रेशन का एक बड़ा कारण माना जाता है.
रेमी जर्मनी में रहती हैं. वह फुल-टाइम नौकरी करने वाली महिला हैं और एक मां भी हैं. उन्होंने बताया कि यह असंतुलन अनजाने में ही शुरू हो जाता है. उन्होंने कहा, "मेरे लिए यह एक सामान्य बात थी. नौकरी भी करना और घर का ख्याल भी रखना.”
रेमी ने बताया कि दिन भर ऑफिस के काम के बाद अक्सर खाना बनाने की जिम्मेदारी उन्हीं की होती थी. उन्होंने कहा, "मुझे खाना बनाना पसंद है, लेकिन कभी-कभी जब मेरा दिन अच्छा नहीं बीतता, तो यह काम मुझे बोझ जैसा लगने लगता है.”
इस मामले पर डीडब्ल्यू ने कई महिलाओं से बात की. इस दौरान एक पैटर्न देखने को मिला कि उनके पति अक्सर तभी मदद करते थे जब उनसे कहा जाता था.
शादी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए रेमी ने बताया कि उन्हें अपने पति को लगातार याद दिलाना पड़ता था कि ‘यह काम करना है. क्या आप प्लीज इसे कर देंगे?' वह बताती हैं कि हर चीज का हिसाब दिमाग में रखना भी उस तनाव का हिस्सा है जिसे हम महिलाएं झेलती हैं.
रेमी कहती हैं कि मां बनने के बाद उन्हें लगा कि जिम्मेदारियों का सारा बोझ उन पर ही आ गया है. वह बताती हैं, "सुबह उठने से लेकर तैयार होने तक, बच्चा हर चीज के लिए आप ही को ढूंढता है, पिता को नहीं.” उन्होंने यह भी गौर किया कि उनके पति हाथ तभी बंटाते थे, जब वह उनसे मदद मांगती थी.
2005 के अन्य डेटा में भी यह बात सामने आयी है. शोधकर्ताओं ने 128 ऐसे जोड़ों पर अध्ययन किया जो पहली बार माता-पिता बनने वाले थे. यह अध्ययन बच्चे के जन्म से पहले और जन्म के छह महीने बाद तक किया गया. इसमें पाया गया कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं पर घर के काम का बोझ बहुत तेजी से बढ़ा, जबकि पिता पर काम का बोझ लगभग पहले जैसा ही रहा. बच्चों को ज्यादा समय देने के लिए मांओं ने अपने ऑफिस के काम का समय कम कर दिया. नतीजा यह हुआ कि वे अपने जीवन और हालात से, पहले के मुकाबले कम खुश नजर आईं.
छिपा हुए बोझ सामने कैसे आएगा
इशिता पटेरिया, भारत में रहती हैं और वह एक काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट हैं. वह कपल्स की मदद करती हैं ताकि वे घर के उस 'छिपे हुए' तनाव को साफ तौर पर देख और समझ सकें, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है.
पटेरिया अक्सर पुरुषों से एक महीने के लिए घर के सारे काम संभालने को कहती हैं. उन्होंने कहा, "इससे उनमें सहानुभूति पैदा होती है. महीने के आखिर में, जब वे काम का बोझ देखते हैं, तो कई पुरुष पार्टनर ज्यादा साथ देना शुरू कर देते हैं.”
साल 2025 की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि पुरुषों के मन में घर की जिम्मेदारियों को लेकर ज्यादा समझ और सहानुभूति पैदा करने से स्थिति सुधर सकती है. इस रिपोर्ट के शोधकर्ता इटली के थे. उन्होंने पाया कि इटली के साथ-साथ पूरे अमेरिका और यूरोप में भी यही स्थिति देखी गई. वहां के घरों में भी परिवार और घर से जुड़ी ज्यादातर दिमागी और मानसिक जिम्मेदारियां महिलाएं ही उठाती रही हैं.
देखा गया कि इस दिमागी मेहनत की वजह से महिलाओं में तनाव का स्तर बढ़ गया और उनके सुख-चैन में कमी आई. साथ ही, पुरुषों के मुकाबले इसका उनकी नौकरी और करियर पर भी कहीं ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ा.
यालोम ने गौर किया कि कई पुरुषों में उस मानसिक मेहनत की समझ ही नहीं होती जो महिलाएं करती हैं. अक्सर, एक पुरुष को इस बात का अहसास तक नहीं होता कि घर में क्या-क्या काम किए जा रहे हैं.
भले ही पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों, फिर भी महिलाओं को घर आकर एक ऐसी 'दूसरी शिफ्ट' पूरी करनी पड़ती है जो किसी को दिखाई नहीं देती. यह स्थिति न केवल उनके तनाव को बढ़ाती है, बल्कि इस वजह से उनकी खुशहाली पर भी असर पड़ता है और लंबे समय में उनकी सेहत पर असर पड़ सकता है.
यालोम बताती हैं, "महिलाएं न केवल अपने पुरुष पार्टनर, बल्कि बच्चों और पूरे घर की देखभाल के लिए बहुत ज्यादा अतिरिक्त मेहनत करती हैं. यह एक बड़ा बोझ होता है और उनके तनाव को बढ़ा देता है. आखिरकार यह तनाव महिलाओं की सेहत पर बुरा असर डालता है.”
रिश्तों में संतुलन बनाने की जरूरत
पिछले दो दशकों में आर्थिक स्थिति काफी बदली है. आज कई घरों में महिलाएं पुरुषों के बराबर कमा रही हैं या घर का खर्चा उठाने वाली मुख्य सदस्य हैं. इसके बावजूद, समाज की सोच अब भी पुरानी है और वह महिलाओं से वही पारंपरिक उम्मीदें रखते हैं.
महिलाएं इस असंतुलन की भारी कीमत चुकाती हैं. जैसा कि ऊपर बताए गए अध्ययनों से पता चलता है कि यह उनकी मानसिक सेहत, तनाव के स्तर और लंबे समय की खुशहाली को सीधे तौर पर प्रभावित करती है.
पब्किल स्पेस में बराबरी मांगती महिलाओं का संघर्ष
एनी कहती हैं, "पुरुष-प्रधान समाज महिलाओं से अपना अस्तित्व भूल जाने की उम्मीद करता है. हमें अक्सर यही सिखाया जाता है कि खुद की इच्छाओं और वजूद को खत्म करके ही प्यार निभाया जा सकता है. लेकिन प्यार अपनी मर्जी से किया जाने वाला काम है, न कि कोई थोपा गया बोझ.”
एनी कहती हैं कि जब उन्हें यह समझ आया, तो वे मानसिक और भावनात्मक रूप से टूटने से बच गईं. उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज की पुरानी सोच से अलग होकर 'देखभाल करने' का असली मतलब समझा. जैसे मुझे कपड़े धोने बिल्कुल पसंद नहीं हैं और यह बात मैं साफ तौर पर कहती हूं. मैं चाहूंगी कि कोई और यह काम मेरे लिए कर दे ताकि मुझे यह बोझ न उठाना पड़े.
एनी की तरह अपनी सीमाएं तय करना और पटेरिया के तरीके से एक-दूसरे की मेहनत को समझना, ये दोनों बातें मिलकर आज के दौर के रिश्तों को मजबूत बना सकती हैं. इससे पति-पत्नी सोच-समझकर घर के कामों और मानसिक बोझ को बराबर बांट सकते हैं. नतीजा यह होगा कि रिश्ते में बराबरी आएगी, बातचीत बढ़ेगी और एक-दूसरे को बेहतर सपोर्ट मिलेगा.
(The above story first appeared on LatestLY on Dec 20, 2025 04:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

