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क्या स्मार्ट स्लीपर का नया डिजाइन यूरोप में नाइट ट्रेनों का चलन बढ़ा पाएगा?

यूरोप और स्लीपर ट्रेनों का रिश्ता कभी जुड़ा, तो कभी टूटा.

क्या स्मार्ट स्लीपर का नया डिजाइन यूरोप में नाइट ट्रेनों का चलन बढ़ा पाएगा?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

यूरोप और स्लीपर ट्रेनों का रिश्ता कभी जुड़ा, तो कभी टूटा. एक दौर था जब स्लीपर ट्रेनें बड़ी लोकप्रिय हुआ करती थीं, लेकिन फिर जैसे इनके दिन लद गए. क्या नाइट ट्रेनों का चलन बढ़ाने की कोशिशें रंग लाएंगी?12 दिसंबर की शाम थी, जब स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख से रवाना हुई "नाइटजेट पैसेंजर ट्रेन" जर्मनी की राजधानी बर्लिन में स्टेशन के 13 नंबर प्लेटफॉर्म पर आने वाली थी. ऐन और यूरी समेत दर्जनों प्रदर्शनकारी रंगबिरंगे पजामों में तैयार खड़े थे, लेकिन ट्रेन पर चढ़ने के लिए नहीं.

जिस तरह बर्लिन स्टेशन पर ऐक्टिविस्ट जमा हुए, उसी तरह लिस्बन से लेकर हेलसिंकी तक यूरोप की 12 राजधानियों के ट्रेन स्टेशनों पर कई यूरोपीय ऐक्टिवस्ट इकट्ठा हुए. उनकी मांग है कि पूरे महाद्वीप में शहरों को जोड़ने वाली नाइट ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जाए.

जैसा कि नाम से जाहिर है, नाइट ट्रेन या ओवरनाइट ट्रेन ऐसी रात्रिकालीन ट्रेनों को कहा जाता है जो देर शाम किसी जगह से चलें और तड़के अपने गंतव्य तक पहुंच जाएं. यानी, ट्रेन में रात की यात्रा. भारत में रात्रिकालीन ट्रेनें बहुत आम हैं. इन ट्रेनों के स्लीपर और एसी कोच में लेटने के लिए बर्थ होती है.

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वापस आते हैं बर्लिन स्टेशन के 13 नंबर प्लेटफॉर्म पर. यहां नीली और सफेद धारियों वाली पोशाक पहने एक ऐक्टिविस्ट ने कहा, "मैं अब विमान से यात्रा नहीं करना चाहती, क्योंकि मुझे पता है कि इससे कितना नुकसान होता है. लेकिन मेरी यात्रा की चाह अब भी बरकरार है." ऐन की बेटी ने बताया, "ट्रेन में बड़ी अच्छी नींद आती है, क्योंकि आपको लगातार आगे-पीछे झूलने जैसा एहसास होता है."

वहीं, यूरी का कहना था कि उन्हें ट्रेन यात्रा की सादगी बहुत भाती है. वह कहती हैं कि इसमें न तो हवाई अड्डे तक पहुंचने की दौड़- भाग है, न ही चेक-इन की लंबी लाइनें और न ही विमान की तंग सीटों पर बैठने और इंतजार करने की परेशानी. यूरी ने बताया, "मैं एक शहर में नाइट ट्रेन पकड़ती हूं और सो जाती हूं. फिर सीधे दूसरे शहर में उतरती हूं."

नाइट ट्रेनों के प्रति आकर्षण नई बात नहीं है. 20वीं सदी के मध्य तक तो वे यूरोप में काफी लोकप्रिय हुआ करती थीं. फिर जैसे‑जैसे पूरे महाद्वीप में हाई-वे का विस्तार बढ़ता गया, नाइट ट्रेनों में यात्रियों की दिलचस्पी कम होने लगी.

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और फिर हवाई यात्रा का प्रचलन बढ़ने लगा. 1980 का दशक आते-आते हवाई यात्रा ज्यादा किफायती होने लगी. अब हालत यह है कि जो लोग पुराने दौर की रात्रिकालीन ट्रेनों का अनुभव लेना चाहते हैं, उनके लिए गिने-चुने कनेक्शन और बहुत सीमित स्लीपर ट्रेनें उपलब्ध हैं.

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साल 2023 की बात है, जब ऑस्ट्रिया में एक बदलाव देखा गया. 'ऑस्ट्रियन फेडरल रेलवे' ने पेरिस‑बर्लिन और विएना के बीच लोकप्रिय रास्तों को दोबारा चालू किया.

मगर, यह ज्यादा दिन चला नहीं. दो साल बाद ही, फ्रांस में सरकारी सब्सिडी में कटौती के चलते इस मार्ग का संचालन फिर रोक दिया गया. अब इस रूट को 'यूरोपियन स्लीपर' नाम के एक बेल्जियम‑डच नाइट ट्रेन ऑपरेटर ने अपने हाथ में ले लिया है. इस रूट में ब्रसेल्स को भी स्टॉप बनाया जाएगा.

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हाल ही में स्वीडिश सरकारी रेलवे ने भी बर्लिन‑स्टॉकहोम रूट से हटने का फैसला किया है. इस मार्ग की शुरुआत 2022 में ही हुई थी. इनमें से कुछ रास्तों को अब निजी कंपनियां 'यूरोपियन स्लीपर' और अमेरिकी समूह 'आरडीसी' संभालेंगी. हालांकि, ट्रेनें नियमित नहीं बल्कि चुनिंदा दिनों पर ही चलेंगी.

परिवहन विशेषज्ञ फिलिक्स बेरशिन बताते हैं, "आज भी यूरोप में नाइट ट्रेनें मौजूद हैं, इसका श्रेय यूरोपियन स्लीपर जैसे आदर्शवादियों को जाता है." वह बताते हैं कि यह कंपनी बड़े‑पैमाने पर क्राउडफंडिंग के जरिए रकम जुटाती है.

साल 2024 में बेरशिन ने जर्मनी के केंद्रीय परिवहन मंत्रालय के लिए यूरोप में नाइट ट्रेन यातायात की पड़ताल की. वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आमतौर पर ज्यादा लागत के कारण स्लीपर कोच वाली ट्रेनें ऑपरेटरों के लिए घाटे का सौदा होती हैं. रात्रिकालीन ट्रेनों पर नाइट सरचार्ज की वजह से कर्मचारियों का भुगतान बढ़ जाता है.

इसके अलावा, सामान्य ट्रेन कोच की तुलना में स्लीपर डिब्बों के भीतर कम यात्री सफर कर पाते हैं. मसलन, जर्मन रेलवे ऑपरेटर डॉयचे बान (डीबी) की आईसीई-4 जैसी हाई‑स्पीड ट्रेनें 918 की संख्या तक यात्रियों को ले जा सकती हैं. वहीं, ऑस्ट्रियन फेडरल रेलवे की नाइटजेट जैसी स्लीपर ट्रेनों में यह संख्या घटकर 254 रह जाती है. इसी तरह, फिनलैंड में इसी तरह की स्लीपर ट्रेन की क्षमता लगभग 500 यात्रियों की है.

बर्लिन रेलने स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 13 पर मौजूद एक प्रदर्शनकारी इस "जगह की कमी" की समस्या को सुलझाना चाहते हैं. साल 2024 में अंटॉन डुब्राउ ने 'लूना रेल' नाम से एक स्टार्ट-अप शुरू किया. इसका लक्ष्य है ऐसे केबिन डिजाइन करना, जिनमें यात्रियों के लिए आराम और प्राइवेसी को जोड़ते हुए ट्रेन की क्षमता का बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया जाए.

सिंगल केबिन: बेहतर अनुभव और अधिक सीटें

इस केबिन का प्रोटोटाइप बर्लिन की टेक्निकल यूनिवर्सिटी में मौजूद है. यह केबिन किसी सामान्य ट्रेन सीट जैसा दिखता है. इसमें एक टेबल, अलग स्टोरेज एरिया, एक शेल्फ, कोट टांगने के हुक और हैंड लगेज रखने की जगह उपलब्ध है.

एक बटन दबाते ही सीट का पिछला हिस्सा 'बैकरेस्ट' नीचे हो जाता है और सीट एक बिस्तर में बदल जाती है. दिन के समय यही सीट एक वर्कस्टेशन की तरह इस्तेमाल की जा सकती है, जो बिजनेस यात्रियों के लिए भी आकर्षक साबित होगी.

अब तक, बैठने की सीमित क्षमता के कारण स्लीपर कोचों को मुख्य रूप से रात में ही इस्तेमाल किया जाता है. डुब्राउ को उम्मीद है कि सिंगल कैबिन का डिजाइन इस स्थिति को बदल सकता है. उन्हें उम्मीद है कि ये कैबिन यात्रियों को बेहतर प्राइवेसी देने के साथ-साथ किफायती भी होंगे.

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एक ट्रेन कोच में इस तरह के 60 कैबिन लगाए जा सकते हैं. इन कैबिनों को दो स्तरों पर एक के भीतर एक फिट किया जा सकता है, दो मंजिल जैसे डिजाइन में. अच्छी बात ये भी है कि इनके लिए नए सिरे से नई ट्रेनें बनाने की जरूरत नहीं है. सेवा से बाहर की गई ट्रेनों में फिर से फिटिंग करके इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा सकता है.

डीडब्ल्यू से बात करते हुए डुब्राउ ने कहा, "हम कोशिश कर रहें हैं कि कम जगह में ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को बैठाया जा सके." उनकी गिनती के मुताबिक, इस डिजाइन की मदद से अधिकतम 18 डिब्बों वाली एक नाइट ट्रेन में करीब 700 यात्री सफर कर सकेंगे.

कीमत तय करेगी यात्रा का माध्यम

साल 2023 में छपी एक स्वीडिश स्टडी के मुताबिक, यात्रा के माध्यम चुनते समय लोगों के लिए कीमत सबसे अहम भूमिका निभाती है. देखा जाए, तो अबतक रात्रिकालीन ट्रेनों का किराया सबसे महंगा रहा है. उदाहरण के तौर पर पेरिस‑बर्लिन के बीच 1,000 किलोमीटर के सफर के लिए पांच‑बर्थ के स्लीपर कंपार्टमेंट का किराया करीब 180 यूरो है. प्राइवेट कैबिन लें, तो किराया लगभग 440 यूरो पड़ता है.

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डुब्राउ, दूसरी श्रेणी के सिंगल कैबिन का किराया करीब 100 यूरो तक लाने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, फर्स्ट क्लास का किराया 150 यूरो के आसपास हो सकता है. वह बताते हैं, "मकसद यह है कि हवाई यात्रा के बराबर कीमत रखी जाए, लेकिन आराम से समझौता किए बिना. ताकि, यात्री ट्रेन की ओर रुख करें."

परिवहन मंत्रालय का सर्वे बताता है कि अगर कीमत तकरीबन बराबर हो, तो करीब एक‑तिहाई यात्री ट्रेन को अपनाना चाहेंगे.

पर्यावरण के लिए क्यों बेहतर है ट्रेन?

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, विमानों की तुलना में ट्रेनें प्रति यात्री लगभग छह गुना कम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती हैं. इसके अलावा, वे ऊर्जा का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल करती हैं और ब्रेक लगाने के दौरान बिजली भी पैदा कर सकती हैं.

डुब्राउ बताते हैं कि उनके स्लीपर केबिन 2030 तक शुरू हो जाएंगे. यूरोपीय आयोग का भी लक्ष्य है कि यूरोप में रेल यात्रियों की हिस्सेदारी दोगुनी की जाए और 2050 तक इसे तीन गुना तक बढ़ाया जाए.

हालांकि, रास्ते में मौजूद निर्माण स्थल जैसी दिक्कतों पर डुब्राउ का कोई नियंत्रण नहीं है. परिवहन विशेषज्ञ फिलिक्स बेरशिन के मुताबिक, "तय समय के आधार पर प्लान बनाना मुमकिन नहीं है."

डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे 'यूरोपियन स्लीपर' कंपनी के लिए प्राग‑ब्रसेल्स नाइट ट्रेन का शेड्यूल तैयार करते हैं. उनका कहना है कि न तो ट्रेनों की आवाजाही का रास्ता मिलता है, न ही स्टेशनों पर रवानगी की जगह और ऊपर से कई नियम तो समझ से परे हैं.

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मगर, कुछ यात्रियों के लिए यात्रा का अनुभव ही असल आकर्षण है. बर्लिन स्टेशन के प्लेटफॉर्म 13 पर ऐन ने बताया कि उन्हें महिलाओं वाले कंपार्टमेंट बेहद पसंद हैं. वह मुसकुराते हुए बताती हैं, "शुरू-शुरू में तो वजह ये थी कि मुझे लगा महिलाएं कम खर्राटे लेंगी. लेकिन, इन कंपार्टमेंटों में मुझे अलग-अलग पीढ़ियों की अद्भुत महिलाओं से मिलने का मौका मिलता है, जिनके पास सुनाने के लिए कमाल की कहानियां होती हैं."

(The above story first appeared on LatestLY on Apr 03, 2026 05:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).