ट्रंप को ईरान पर इजरायली हमले की पहले से थी जानकारी, परमाणु ठिकानों को किया तबाह
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इजरायल ने ईरान पर एक बड़ा हमला कर दिया है. यह हमला ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर महीनों से चल रही बातचीत के नाकाम होने के बाद हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्हें इस हमले की पहले से जानकारी थी.

हालांकि, अमेरिकी सरकार ने साफ किया है कि वह इस हमले में शामिल नहीं है. अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रूबियो ने एक बयान में कहा, "इजरायल ने यह कदम अकेले उठाया है. हम इस हमले में शामिल नहीं हैं और हमारी पहली प्राथमिकता उस इलाके में मौजूद हमारे अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा करना है." उन्होंने यह भी बताया कि इजरायल ने हमले से पहले अमेरिका को सूचित किया था और इसे अपनी आत्मरक्षा के लिए जरूरी बताया था.

इजरायल ने क्यों किया हमला?

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हमले की पुष्टि करते हुए कहा, "हमने ईरान के उन बड़े परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाया है जो ईरानी बम पर काम कर रहे थे. इसके अलावा हमने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के केंद्र पर भी हमला किया है." उन्होंने जोर देकर कहा कि "हमारी लड़ाई ईरान के लोगों से नहीं, बल्कि ईरान की तानाशाही से है."

इजरायली सेना के मुताबिक, इस ऑपरेशन का नाम "ऑपरेशन राइजिंग लायन" रखा गया है. यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि इजरायल को पक्की खुफिया जानकारी मिली थी कि "ईरान परमाणु बम बनाने के बहुत करीब पहुंच गया है."

फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की राजधानी तेहरान में भी धमाकों की आवाजें सुनी गईं. इस हमले के बाद, ईरान की तरफ से जवाबी कार्रवाई की आशंका को देखते हुए पूरे इजरायल में इमरजेंसी लगा दी गई है.

हमले की पृष्ठभूमि

यह तनाव अचानक पैदा नहीं हुआ है. पिछले साल (2024) अप्रैल से अक्टूबर के बीच ईरान और इजरायल एक-दूसरे पर कई मिसाइल हमले कर चुके हैं. इसकी शुरुआत तब हुई जब ईरान ने अप्रैल 2024 में पहली बार सीधे इजरायल की धरती पर हमला किया था.

बातचीत क्यों हुई नाकाम?

इस हमले से पहले ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ परमाणु समझौते पर बातचीत करने की कोशिश कर रहा था. ट्रंप ने नेतन्याहू से हमला न करने और बातचीत को आगे बढ़ने देने के लिए भी कहा था. बातचीत का मुख्य मुद्दा ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम था. अमेरिका चाहता था कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से बंद कर दे, जबकि ईरान इसके लिए "बिल्कुल भी तैयार नहीं" था. इसी बात पर बातचीत अटक गई और आखिरकार यह हमला हो गया.

अब यह साफ नहीं है कि इस हमले के बाद बातचीत की कोई गुंजाइश बची है या नहीं.