पहले जैसी स्थिर और भरोसेमंद नहीं रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था: बोरिस पिस्टोरियस
जर्मन रक्षा मंत्री पिस्टोरियस ने बीते दिनों जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया.
जर्मन रक्षा मंत्री पिस्टोरियस ने बीते दिनों जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया. इस यात्रा में उन्होंने नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और इसे हासिल करने में मध्यम-शक्ति वाले देशों की अहम भूमिका पर जोर दिया.जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों की हालिया यात्रा के दौरान बार-बार इस बात पर जोर दिया कि नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बेहद जरूरी है. उनके मेजबान देशों जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया ने भी सहमति जताई और इस व्यवस्था की अहमियत पर जोर दिया.
मसलन, कैनबरा में ऑस्ट्रेलिया के उप-प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्लेस ने दोनों देशों के साझा मूल्यों को रेखांकित किया. पिछले हफ्ते संसद में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने जोर दिया, "हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून के शासन का सम्मान करते हैं. नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है."
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जर्मन रक्षा मंत्री ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अपनी यात्रा में जितने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस किए, उन सबमें उन्होंने और वार्ताकारों ने इस बात पर भी जोर दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र और यूरोप आपस में कितनी गहराई से जुड़े हैं. पिस्टोरियस ने कैनबरा में कहा, "आज की दुनिया आपस में बहुत मजबूती से जुड़ती जा रही है. दिन-ब-दिन. चाहे हमें यह पसंद हो या न हो. संघर्ष, आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा- ये चाहे दुनिया के किसी एक हिस्से में होते हों, लेकिन इनका कारण दुनिया के किसी और सुदूर हिस्से में हो सकता है."
जर्मनी की नई भूमिका
लेकिन नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर बार-बार जोर देना इस ओर भी इशारा करता है कि कहीं-न-कहीं कुछ ठीक नहीं है. पहले से स्थापित निश्चितताएं खत्म हो रही हैं. नई रूपरेखाएं उभर रही हैं, लेकिन उनकी असली परीक्षा अभी नहीं हुई है.
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ऐसे में पिस्टोरियस की यात्रा रेखांकित करती है कि जर्मनी जैसे देश, जो सुरक्षा‑नीति के मामले में हमेशा से अमेरिका पर निर्भर रहे हैं और आज भी निर्भर हैं, उनके लिए अपनी नई और ठोस भूमिका खोज पाना चुनौतीपूर्ण है. यह बात इस यात्रा के दौरान भी बार-बार स्पष्ट नजर आई है.
अमेरिका के बिना यह संभव नहीं
पिस्टोरियस ने 'नेशनल प्रेस क्लब ऑफ ऑस्ट्रेलिया' में जर्मनी की संप्रभुता पर जोर देते हुए कहा, "हमें अपने ध्यान का केंद्र बदलना चाहिए और सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि चीन क्या करता है, रूस क्या करता है, या अमेरिका क्या करता है? वे दुनिया की महाशक्तियां हैं, लेकिन सभी मध्यम शक्ति वाले देश अगर एकजुट हों, भरोसेमंद हों और अपने लक्ष्यों के लिए प्रतिबद्ध हों, तो वे भी कम-से-कम इन महाशक्तियों जितने ही ताकतवर तो हो सकते हैं. इसके लिए एकता और पक्के इरादे की जरूरत है. इस ढांचे के भीतर हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं."
लेकिन यह कहने के बावजूद जर्मन रक्षा मंत्री को पता है कि किसी भी तरह की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था महाशक्तियों और बड़ी ताकतों के बिना संभव नहीं है. जैसा कि उन्होंने कहा भी, "एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को महाशक्तियों की जरूरत होती है. जो आज महाशक्ति हैं और वो, जो भविष्य में बनना चाहती हैं, उनके लिए बस टेबल पर आना ही जरूरी नहीं है. बल्कि, साथ मिलकर सक्रिय रूप से उसे आकार देना भी जरूरी है. हालांकि, इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की प्राथमिकताओं को बदलने की आवश्यकता है और यह देखना होगा कि क्या महाशक्तियां इसके लिए तैयार हैं."
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इस संदर्भ में पिस्टोरियस और साहस दिखाने की अपील करते हैं. वह लगातार कुछ अंतरराष्ट्रीय संबंधों की तुलना एक खराब रिश्ते से करते हैं. उनके अनुसार, "कोई भी जो हमेशा सिर्फ अपने प्रतिद्वंद्वी या साथी पर ही ध्यान केंद्रित करता है, कभी भी स्वतंत्र रूप से कदम नहीं उठाता है. वे डर द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं. और, डर के आधार पर लिए गए फैसले हमेशा गलत होते हैं."
नए गठबंधनों की कवायद?
स्पष्ट है कि पिस्टोरियस "मध्यम शक्तियों" की एक नई गठबंधन‑व्यवस्था की कल्पना कर रहे हैं. इसमें वह जर्मनी के साथ जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को गिनते हैं. वह मानते हैं कि तथाकथित ग्लोबल साउथ को भी इसमें अधिक मजबूती से जोड़ा जाना चाहिए.
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जैसा कि उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि वैश्विक दक्षिण के देश भी उस प्रभाव के बारे में सोच रहे हैं, जिसे वे स्वाभाविक रूप से चाहते हैं. अब सवाल यह है कि इसे कैसे सुनिश्चित किया जाए." पिस्टोरियस यह भी स्वीकार करते हैं कि भारत, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की जैसे अन्य देश लंबे समय से जो मांग कर रहे हैं, उसे मान्यता दी जानी चाहिए. यानी, ऐसी वैश्विक शक्ति‑संरचना में सुधार हो, जिसे वे अनुचित मानते हैं. इस संरचना को अधिक समावेशी व्यवस्था में बदलना आवश्यक है.
साल 2023 में पिस्टोरियस ने भारत और इंडोनेशिया की यात्रा की थी. दिल्ली में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था, "हमारी रणनीतिक साझेदारी को वर्तमान क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिति के चलते और अधिक गतिशीलता विकसित करनी होगी."
लेकिन, भारत जैसी परमाणु शक्ति जिसके रूस के साथ पारंपरिक रूप से घनिष्ठ सैन्य‑राजनीतिक संबंध रहे हैं, वह जर्मनी की नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संबंधी धारणाओं को किस हद तक साझा करता है यह स्पष्ट नहीं है.
श्टिफटुंग विसेनचाफ्ट उंट पोलीटिक (एसडब्ल्यूपी) के एक नए अध्ययन के अनुसार भारत खुद को "वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधि" मानता है. अपने औपनिवेशिक अतीत के कारण भारत किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप या पश्चिम से आने वाले निर्देशों को लेकर अत्यंत संवेदनशील है.
एसडब्ल्यूपी के अनुसार, भारत का लक्ष्य यह है कि वह "एक बहुध्रुवीय व्यवस्था में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाए" और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में, विशेषकर हिंद‑प्रशांत क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आए.
डर से आजादी
पिस्टोरियस की यात्रा से साफ है कि वह मौजूदा इंटरनेशनल ऑर्डर को कमजोर होता हुआ देख रहे हैं. उनका मानना है कि इस व्यवस्था में सुधार की जरूरत है. हालांकि, वह नहीं चाहते कि नई वैश्विक व्यवस्था बनाने का काम रूस जैसे देशों के हाथ में जाए. उसे वह "आक्रामक और अपने हितों के अनुसार नियम बदलने वाला" मानते हैं.
साथ ही, चीन के बढ़ते प्रभाव का भी मुकाबला करना जरूरी है. यूरोपीय संघ 2019 में ही चीन को "सिस्टम का प्रतिद्वंदी" करार दे चुका है, इसलिए उसके प्रभाव का जवाब देना भी जरूरी है. इसके अलावा, वह मांग करते हैं कि यूरोप अमेरिका पर अपनी निर्भरता घटाए. पिस्टोरियस मानते हैं कि मध्यम शक्ति वाले देशों के बीच एक साझा गठबंधन होना चाहिए.
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इसमें सबसे जरूरी बात यह है कि सभी देश नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्वीकार करें. जर्मन रक्षा मंत्री के अनुसार, "सबसे पहली बात यह है कि हम इस बात पर सहमत हो कि हमें एक अंतरराष्ट्रीय, नियम-आधारित व्यवस्था की आवश्यकता है." और जब इस बात को स्वीकार्यता मिल जाए, "तो हमें- इस बात को सही तरह कैसे कहूं- उस व्यवस्था के केंद्र को थोड़ा सा स्थानांतरित करना होगा."
हालांकि, कुछ मूल सिद्धांत ऐसे हैं जिन्हें हमेशा बनाए रखना जरूरी है. जैसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सम्मान, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता. देखा जाए तो जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को इस पहल में शामिल करना फिर भी आसान हो सकता है, लेकिन असली चुनौती भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों को साथ लाना होगा.