पाकिस्तान ने हिंदू और ईसाई महिलाओं की चीन में 'उप-पत्नी' के तौर पर की मार्केटिंग

पाकिस्तान हिंदू और ईसाई महिलाओं को चीन में उप-पत्नी या रखैल और मजबूर दुल्हन के तौर पर मार्केटिंग कर रहा है. ये बात अमेरिका के शीर्ष राजनयिक सैमुअल ब्राउनबैक ने कही है. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पाकिस्तान को कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न बताया है.

पाकिस्तान का झंडा (Photo Credits: File Image)

न्यूयॉर्क, 9 दिसंबर: पाकिस्तान (Pakistan) हिंदू और ईसाई महिलाओं को चीन में उप-पत्नी या रखैल और मजबूर दुल्हन के तौर पर मार्केटिंग कर रहा है. ये बात अमेरिका के शीर्ष राजनयिक सैमुअल ब्राउनबैक ने कही है. ब्राउनबैक ने मंगलवार को संवाददाताओं से कहा कि चीनी पुरुषों के लिए "दुल्हनों के स्रोतों में से एक धार्मिक अल्पसंख्यक ईसाई (Christian) और हिंदू (Hindi) महिलाएं हैं, जिनकी उपपत्नी के तौर पर मार्केटिंग की जा रही है और चीन में दुल्हन बनने के लिए मजबूर किया जाता है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि उनकी वहां स्थिति अच्छी नहीं है और धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव होता है."

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत पाकिस्तान को कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न (सीपीसी) बताया है. चीन द्वारा दशकों से लागू की गई एक-बच्चे की नीति के कारण और लड़के को प्राथमिकता दिए जाने के कारण चीनी पुरुषों के लिए महिलाओं की खासी कमी हो गई है जिसके कारण वे अन्य देशों से मिस्ट्रेस और मजदूरों के रूप में दुल्हनों को आयात करते हैं. अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ)ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के अन्य मुद्दों का हवाला देते हुए भारत को सीपीसी पर रखने की सिफारिश की थी, लेकिन राज्य सचिव माइक पोम्पिओ ने सोमवार को पदनामों की घोषणा करते समय इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया.

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हालांकि ब्राउनबैक ने कहा कि वाशिंगटन भारतीय स्थिति को करीब से देख रहा है और ये मुद्दे सरकार, उच्च सरकारी स्तर पर उठे हैं और उठते रहेंगे. हिंदुओं, ईसाइयों, बौद्धों और सिखों को पड़ोसी इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों में धार्मिक उत्पीड़न से बचाकर उनको देश में नागरिकता देने के लिए नागरिक संशोधन कानून लाया गया है लेकिन ये कानून सामान्य प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद मुसलमानों को भी नागरिकता प्राप्त करने से नहीं रोकता है.

अमेरिका में भी सीएए जैसा एक कानूनी प्रावधान है जो ईरान के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को शरण देता है. पाकिस्तानी रिपोर्टर द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या पाकिस्तान को सीपीसी पदनाम देना और भारत को नहीं देना, ये पोम्पिओ का दोहरा मानदंड है? इस पर ब्राउनबैक ने कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ काफी कार्रवाई सरकार द्वारा की जाती है, जबकि भारत में ऐसा नहीं है.

उन्होंने कहा, "ईशनिंदा के आरोप वाले दुनिया के आधे लोग केवल पाकिस्तान में बंद हैं. भारत में सीएए जैसी कुछ कार्रवाइयां सरकार द्वारा की जाती हैं, लेकिन सांप्रदायिक हिंसा आदि होने पर हम देखते हैं कि क्या इसके लिए पर्याप्त पुलिस फोर्स लगाई गई या सांप्रदायिक हिंसा के बाद न्यायिक कार्रवाई हुई या नहीं." एक अमेरिकी रिपोर्टर द्वारा पूछ जाने पर कि पोम्पिओ ने भारत को सीपीसी नामित करने की यूएससीआईआरएफ की सिफारिश का पालन क्यों नहीं किया. इस पर ब्राउनबैक ने कहा, "सचिव द्वारा लिए गए निर्णय के बारे में मैं नहीं बोल सकता हूं."

लेकिन उन्होंने कहा कि पोम्पिओ भारत में होने वाली सांप्रदायिक हिंसा के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और इससे जुड़े कुछ मुद्दों के बारे में भी जानते हैं. पोम्पिओ ने रूस और वियतनाम को भी सीपीसी के रूप में नामित करने की सिफारिशों का पालन नहीं किया. पाकिस्तान के अलावा पोम्पिओ ने चीन, म्यांमार इरिट्रिया, ईरान, नाइजीरिया, उत्तर कोरिया, सऊदी अरब, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को सीपीसी सूची में डाल दिया है.

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