जर्मनी की न्याय मंत्री यौन उत्पीड़न मामलों में डेट-रेप ड्रग्स के इस्तेमाल पर सख्त सजा की मांग कर रही हैं. हालांकि पीड़ित महिलाओं का कहना है कि इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए और भी कदम उठाने की जरूरत है.केओ-कीन ऑफर (नॉकआउट- नो विक्टिम) की संस्थापक और अध्यक्ष नीना फुक्स कहती हैं, "मैं सिर्फ अपने लिए नहीं लड़ रही हूं बल्कि उन सभी के लिए लड़ रही हूं जो यौन हिंसा का शिकार हुए हैं या आगे हो सकते हैं." साल 2013 में फुक्स के साथ उस समय रेप हुआ जब वह डेट-रेप ड्रग्स के प्रभाव में थीं. उनके पास आरोपी के खिलाफ डीएनए सबूत थे. लेकिन फिर भी केस बंद कर दिया गया. साल 2020 में उन्होंने छह महिलाओं के साथ मिलकर 'केओ' की शुरुआत की और तब से वह लगातार पीड़ित महिलाओं के लिए आवाज उठाती रही हैं.
हाल ही में उन्हें सख्त कानून बनाने की योजनाओं के बारे में पता चला. इसके तहत बलात्कार के लिए डेट-रेप ड्रग्स का उपयोग करना हथियार के इस्तेमाल जितना गंभीर अपराध माना जाएगा. दोषी को कम से कम पांच साल की जेल की सजा होगी.
फुक्स इसे किसी जीत के रूप में नहीं देखती हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मुझे निराशा और हताशा दोनों महसूस हुई. अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो उससे वास्तव में पीड़ितों को मदद और फायदा मिलना चाहिए. इसलिए मैं और अन्य विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति है."
कड़ी सजा और सख्त कानूनों का कोई असर नहीं होता अगर गिरफ्तारी की दर बहुत कम हो. वह कहती हैं, "जर्मनी में रेप के हर सौ मामलों में केवल एक मामले में सजा होती है. डेट-रेप ड्रग्स के मामलों में यह संख्या और भी कम है क्योंकि इसकी जांच करना मुश्किल होता है."
असर जल्दी होता है, पता लगाने का समय बहुत कम
डेट-रेप ड्रॉप्स रंगहीन और गंधहीन पदार्थ होता है जिन्हें अपराधी चुपके से पीड़ित के ड्रिंक में मिला देते हैं. इसे कपड़ों के ऊपर से सुई के जरिए शरीर में इंजेक्ट भी किया जा सकता है. दस से बीस मिनट के भीतर ही इसका असर दिखने लगता है. पीड़ित अपना बचाव नहीं कर पाते और बेहोश हो जाते है. 12 घंटे बाद खून या पेशाब की जांच में इनका कोई निशान नहीं मिलता.
न्याय मंत्री स्टेफानी हुबिग ने 13 मई को बर्लिन में कानून पेश करते हुए कहा, "नॉकआउट ड्रॉप्स देकर बलात्कार करना बेहद खतरनाक और गंभीर यौन हिंसा है. इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है. आपराधिक कानून को इसके खिलाफ सख्ती से जवाब देना चाहिए. इस हिंसा से प्रभावी सुरक्षा के लिए कड़ी सजा की आवश्यकता है."
वह आगे कहती हैं, "हमें खास तौर पर महिलाओं को हमलों से बचाना है. इसके लिए आपराधिक कानून के साथ दूसरे उपायों पर भी काम करना होगा."
पुलिस नहीं करती पीड़ित महिलाों का विश्वास
जर्मनी में डेट-रेप ड्रग्स को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद अप्रैल 2013 में फुक्स के साथ जो हुआ था वैसा ही 13 साल बाद भी हो सकता है. वह उस समय म्यूनिख पुलिस के पास गईं थीं. वहां यौन अपराधों के लिए एक विशेष इकाई भी मौजूद है. अधिकारियों ने उनकी बात पर भरोसा नहीं किया. फुक्स इस अनुभव को 'मुंह पर तमाचे' की तरह मानती हैं.
फुक्स का कहना है कि आज भी महिलाओं को ऐसे ही अनुभवों से गुजरना पड़ता है. बलात्कार की शिकार एक महिला बताती हैं कि पुलिस ने छह घंटे तक उनसे पूछताछ की. उनसे सवाल किया गया कि क्या वह डेटिंग ऐप टिंडर का इस्तेमाल करती हैं और कभी किसी डेट के साथ घर गई थी. यहां तक कि आज भी कई पुलिस स्टेशन समय पर यूरिन सैंपल नहीं लेते. उन्हें लगता है कि यह पदार्थ लंबे समय तक शरीर में रहता है.
फुक्स बताती हैं, "पुलिस और न्यायपालिका को यौन हिंसा, डेट-रेप ड्रग्स और ट्रॉमा के बारे में ट्रेनिंग दी जाए ताकि पीड़िताओं को पुलिस के पास जाने पर अपराध से ज्यादा खराब अनुभव का डर न रहे."
नेताओं को स्कूलों में भी जागरूकता कार्यक्रमों पर दोबारा सोचने की जरूरत है. फुक्स का मानना है कि स्कूलों में हमेशा पीड़िताओं की सुरक्षा की बात होती है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वहीं भविष्य में अपराध करने वाले भी बैठे होते हैं.
‘अपनी ड्रिंक का ध्यान रखो' हमेशा नहीं बचा सकता
फुक्स ने इस सोच को भी गलत बताया कि क्लब में सिर्फ अपनी ड्रिंक पर नजर रखने से आप सुरक्षित रहेंगे. माता- पिता अपने बच्चे को ‘अपनी ड्रिंक पर नजर रखो' समझाकर ही क्लब भेजते हैं. इसके पीछे मंशा सही हैं लेकिन कई बार यह सलाह बेकार साबित होती है. ड्रिंक में पहले से ही पदार्थ मिला हो सकता है. शरीर में छोटी सुई से ड्रग्स डाली जा सकती है. इसके अलावा इससे पीड़िता को ही दोष देने की सोच को बढ़ावा मिलता है कि उसने पर्याप्त सावधानी नहीं बरती. बचने का सबसे सुरक्षित तरीका समूह में रहना है.
फुक्स बताती हैं, "यौन अपराध कानून को 'यस मीन्स यस' मॉडल में बदलना वास्तव में मददगार होगा. जहां व्यक्ति ने साफ तौर पर सहमति नहीं दी, ऐसे यौन संबंध को दंडनीय माना जाए. फिलहाल जर्मनी में 'नो मीन्स नो' मॉडल लागू है जिसमें अक्सर महिलाओं को यह साबित करना पड़ता है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से विरोध किया था."
अध्ययन: कई संदिग्ध मामले, लेकिन बहुत कम मामलों में मुकदमा
खेमनित्स तकनीकी विश्वविद्यालय में यूरोपीय प्रबंधन की जूनियर प्रोफेसर शार्लोटे फोर्स्टर जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड में नॉकआउट ड्रॉप्स की व्यापक समस्या का अध्ययन कर रही हैं. वह 'डोंट नॉक मी आउट' नाम की स्टडी का नेतृत्व कर रही हैं जिसमें 14 साल या उससे अधिक उम्र के युवा ऑनलाइन सर्वे के जरिए गुमनाम रूप से अपने अनुभव साझा करते हैं. अब तक 3,000 लोग इसमें भाग ले चुके हैं और शुरुआती नतीजों ने गंभीर चिंता पैदा की है.
फोर्स्टर ने डीडब्ल्यू को बताया, "हमने जर्मनी के 1,802 लोगों के शुरुआती डेटा का विश्लेषण किया. इनमें से 725 लोगों को शक था कि उनकी जानकारी के बिना उन्हें नॉकआउट ड्रॉप्स दी गई थी. हमारे प्रतिभागियों के मुताबिक सिर्फ 23 मामलों में कानूनी कार्रवाई हुई. सजा बढ़ा देना सही दिशा में एक जरूरी कदम जरूर है लेकिन अगर कानूनी कार्रवाई ही नहीं होगी तो इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा. यदि ज्यादातर मामलों में सजा नहीं होती तो इससे अपराधियों का डर खत्म होने लगेगा."
अगर तय प्रक्रिया ना हो तो सख्त कानून भी बेअसर
फोर्स्टर ने अपनी मौजूदा स्टडी और संघीय आपराधिक पुलिस कार्यालय द्वारा परिवार एवं आंतरिक मंत्रालयों के किए गए अध्ययन के मुख्य बिंदु बताए. उनके अनुसार लगभग हर 20 में से एक जर्मन को शक है कि कभी ना कभी उसे ड्रग देकर हमला किया गया है. लेकिन ऐसे केवल 10 में से एक मामले की ही रिपोर्ट दर्ज होती है. केवल 8 प्रतिशत मामलों में खून, पेशाब या दूसरे नमूने लिए जाते हैं.
सार्वजनिक जगहों पर खतरे को जरूरत से ज्यादा माना जाता है जबकि निजी जगहों पर इसे कम आंका जाता है. हालांकि इतने गंभीर मामलों के बाद भी अभी 'स्पाइकिंग' या महामारी जैसी स्थिति पैसा नहीं हुई है.
फोर्स्टर आलोचना करती हैं, "हमें तय प्रक्रिया की जरूरत है. जब कोई व्यक्ति संदेह के साथ पुलिस, अस्पताल, फैमिली डॉक्टर या स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाए तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि आगे क्या करना है. कर्मचारियों के प्रशिक्षित ना होने या पीड़िताओं को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से समय बर्बाद नहीं होना चाहिए. अगर ये बदलाव नहीं हुए तो कानून में संशोधन का शायद असर नहीं दिखेगा."
कुछ महीनों में फोर्स्टर अपनी ड्रग रेप स्टडी के अंतिम नतीजे पेश करेंगी. हालांकि उनके रिसर्च प्रोजेक्ट को अभी तक सरकारी फंडिंग का इंतजार है.













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