Chhatrapati Shivaji Maharaj Statue: इज़राइल में लगेगी छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा, जानें यहूदी-मराठा सैनिकों का ऐतिहासिक संबंध

इजरायल ने भारत के साथ सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए अपने एक प्रमुख शहर में छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है. यह फैसला मराठा साम्राज्य और यहूदी 'बेने इजरायल' समुदाय के ऐतिहासिक सैन्य संबंधों को सम्मान देने के लिए लिया गया है.

Chhatrapati Shivaji

 Chhatrapati Shivaji Maharaj Statue:  भारत और इजरायल के बीच सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को एक नया आयाम मिलने जा रहा है. इजरायल सरकार ने अपने एक प्रमुख शहर में 17वीं शताब्दी के महान योद्धा और मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की एक भव्य प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है. इस ऐतिहासिक परियोजना की घोषणा 6 जून 2026 को 'शिवराज्याभिषेक दिन' (शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक की 352वीं वर्षगांठ) के अवसर पर की गई. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पहल का स्वागत करते हुए राज्य सरकार की ओर से पूर्ण सहयोग देने का भरोसा दिया है.

द्विपक्षीय और सांस्कृतिक संबंधों को मिलेगी मजबूती

मुंबई में इजरायल के महावाणिज्य दूत (Consul General) यानिव रेवाच ने इस परियोजना के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि यह प्रतिमा दोनों देशों के नागरिकों को जोड़ने वाले एक दीर्घकालिक स्मारक के रूप में कार्य करेगी. इसका मुख्य उद्देश्य इजरायल के आम नागरिकों को छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन, उनके आदर्शों और उनकी वीरता से परिचित कराना है.  यह भी पढ़े: Chhatrapati Shivaji Maharaj Jayanti 2026: सोनाली बेंद्रे और विक्की कौशल ने छत्रपति शिवाजी महाराज को किया नमन, ‘शेर दिल राजा’ को दी भावभीनी श्रद्धांजलि

इजरायली राजनयिक ने बताया कि भारत यात्रा के दौरान उन्होंने इजरायल के नायकों के प्रति भारतीयों में गहरा सम्मान देखा. इसी के जवाब में अब इजरायल में भारत के महान नायक शिवाजी महाराज के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है.

महाराष्ट्र सरकार ने दिया पूर्ण सहयोग का आश्वासन

मुंबई में आधिकारिक बैठक के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस प्रस्ताव को एक ऐतिहासिक पहल बताया. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इजरायल सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह देश और महाराष्ट्र के लिए गर्व का क्षण है.

स्मारक के निर्माण में ऐतिहासिक सटीकता, कलात्मक बारीकियों और उचित डिजाइन को सुनिश्चित करने के लिए इजरायली दूतावास ने महाराष्ट्र सरकार से तकनीकी और विशेषज्ञ मार्गदर्शन का औपचारिक अनुरोध किया है, जिसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया है.

क्या है 'बेने इजरायल' समुदाय का इतिहास?

इस घोषणा ने महाराष्ट्र और भारतीय यहूदी समुदाय, विशेष रूप से 'बेने इजरायल' (Bene Israel) के बीच सदियों पुराने संबंधों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. माना जाता है कि सदियों पहले एक समुद्री जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद यह समुदाय कोंकण तट पर आकर बसा था. बेने इजरायल समुदाय ने अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखते हुए मराठी भाषा और स्थानीय संस्कृति को पूरी तरह अपना लिया.

स्थानीय इतिहास में इन्हें 'शनिवार तेली' के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि ये शनिवार के दिन यहूदी सबाथ (Sabbath - पवित्र विश्राम का दिन) का कड़ाई से पालन करते हुए अपने व्यापारिक कार्य बंद रखते थे.

मराठा सेना में यहूदी सैनिकों का योगदान

मराठा साम्राज्य के इतिहास में बेने इजरायल समुदाय का सैन्य योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है. ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस समुदाय की युद्ध क्षमताओं को पहचानते हुए उन्हें अपनी थल सेना और नौसेना में शामिल किया था.

यह सैन्य संबंध 18वीं शताब्दी में भी जारी रहा, जब यहूदी सैनिकों और नाविकों ने आंग्रे परिवार के प्रसिद्ध मराठा नौसेना कमांडरों के अधीन अपनी सेवाएं दीं. बाद के औपनिवेशिक काल में भी बॉम्बे प्रेसीडेंसी सेना के भीतर इस समुदाय की एक अत्यधिक सम्मानित टुकड़ी शामिल थी.

वर्तमान स्थिति और प्रभाव

वर्ष 1948 में इजरायल के गठन के बाद, भारत से बेने इजरायल समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इजरायल जाकर बस गया. वर्तमान में, इस समुदाय के लगभग 50,000 से अधिक वंशज इजरायल में रह रहे हैं, जो वहां के सैन्य, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. इसके बावजूद, वे आज भी अपनी महाराष्ट्रीयन परंपराओं और मराठी भाषा से जुड़े हुए हैं. वहीं, भारत में लगभग 5,000 बेने इजरायल सदस्य अभी भी मुंबई, ठाणे और कोंकण क्षेत्र में निवास करते हैं.

विशेष नोट: यह पहली बार है जब मध्य पूर्व (Middle East) के किसी देश में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा स्थापित की जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से न केवल दोनों देशों के कूटनीतिक संबंध मजबूत होंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर मराठा इतिहास को एक नई पहचान मिलेगी.

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