कोरोना संकट के बीच जल संरक्षण पर और बल देने की जरुरत, मानसून है सही मौका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात में कर्नाटक के मंडावली और गुजरात के वडोरा का उदाहरण देते हुए देश के हर नागरिक से पानी बचाने की अपील की. प्रधानमंत्री ने यह अपील ऐसे समय पर की है, जब कोरोना महामारी के कारण प्रति व्यक्ति पानी की खपत तीन गुना बढ़ गई है.

मानसून | प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: PTI)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात में कर्नाटक के मंडावली और गुजरात के वडोरा का उदाहरण देते हुए देश के हर नागरिक से पानी बचाने की अपील की. प्रधानमंत्री ने यह अपील ऐसे समय पर की है, जब कोरोना महामारी के कारण प्रति व्यक्ति पानी की खपत तीन गुना बढ़ गई है. गर्मी के मौसम में देश के कई शहरों का भू-जल स्तर शून्य के करीब पहुंच जाता है, ऐसे में मॉनसून यानी बारिश का मौसम ही एक मात्र मौका है, जब जल को अच्‍छी मात्रा में संचयन किया जा सके. जी हां हम बात करने जा रहे हैं वर्षा जल संचयन की जो अगले दो से तीन महीने में हर व्‍यक्ति की जरूरत है. जल संरक्षण पर बात करने से पहले हम आपको उन दो जगहों के बारे में बतायेंगे, जिनका जिक्र प्रधानमंत्री ने मन की बात 2.0 की 13वीं कड़ी में किया. पहली जगह है कर्नाटक का मंडावली, जहां कामेगौड़ा नाम के साधारण किसान ने अपने क्षेत्र में पानी की कमी को दूर कर दिया. वहीं दूसरा यह वडोदरा जहां जिला प्रशासन क मदद से रेन वॉटर हार्वेस्टिंग प्लांट लगाये गए.

प्रधानमंत्री ने 80-85 साल के बुजुर्ग कामेगौड़ा के लिए कहा, "कामेगौड़ा जी एक साधारण किसान हैं, लेकिन, उनका व्यक्तित्व बहुत असाधारण है. उन्होंने, एक ऐसा काम किया है कि कोई भी आश्चर्य में पड़ जायेगा. कामेगौड़ा अपने जानवरों को चराते हैं, लेकिन, साथ-साथ उन्होंने अपने क्षेत्र में नये तालाब बनाने का भी बीड़ा उठाया हुआ है. वे अपने इलाके में पानी की समस्या को दूर करना चाहते हैं, इसलिए, जल-संरक्षण के काम में, छोटे-छोटे तालाब बनाने के काम में जुटे हैं. कामेगौड़ा अब तक 16 तालाब खोद चुके हैं. अपनी मेहनत से, अपने परिश्रम से. हो सकता है कि ये जो तालाब उन्होंने बनाए हैं, वो बहुत बड़े-बड़े न हों, लेकिन, उनका ये प्रयास बहुत बड़ा है. आज, पूरे इलाके को, इन तालाबों से एक नया जीवन मिला है.

गुजरात के वडोदरा का भी एक उदहारण देते हुए पीएम मोदी ने कहा, "वडोदरा में जिला प्रशासन और स्थानीय लोगों ने मिलकर एक दिलचस्प मुहिम चलाई. इस मुहिम की वजह से आज वडोदरा में, एक हजार स्कूलों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग यानी वर्षा जल संचयन के संयंत्र लगाये हैं. एक अनुमान है, कि इस वजह से, हर साल, औसतन करीब 10 करोड़ लीटर पानी, बेकार बह जाने से बचाया जा रहा है.

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भविष्‍य में गहरायेगा पानी का संकट:

वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार निकट भविष्य में भारत समेत 17 देश पानी के संकट का सामना करने वाले हैं. आजादी के समय हमारी प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5000 क्यूबिक मीटर थी, जो अब घटकर 1540 क्यूबिक मीटर पर आ गई है. ऐसा माना जाता है कि यदि 1500 क्यूबिक मीटर पानी से नीचे यह आंकड़ा गया तो देश को पानी की किल्लत वाला मान लिया जाएगा. इसका मुख्य कारण यह है कि हमारी आबादी, जो आजादी के समय 30-32 करोड़ थी, वो बढ़कर आज 132 करोड़ हो गई है. नदियों के बाद देश में सबसे ज्यादा पानी की आपूर्ति भूजल के दोहन से होती है. हम प्रतिवर्ष करीब 750 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल का उपयोग कर रहे हैं, जबकि बरसात से केवल 450 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमीन में रिचार्ज होता है. मतलब हम अपनी जमा पूंजी में से हर साल पानी ले रहे हैं. नतीजा है कि 22 प्रतिशत ब्लॉक ऐसे हैं, जहां भूजल संकट है. पहले की तुलना में इन दिनों बारिश भी अमूमन कम होती है.

समझिए पानी बचाने की गणित:

ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाईमेट चेंज के कारण अनियमित बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं. इसकी वजह से जो खतरा सामने खड़ा है, सारा विश्व आज उससे घबरा रहा है. हमारा बारिश के मौसमा का समय घट गया है. मॉनसून में 45 दिनों में ही 90 प्रतिशत पानी बरस जाता है. इसलिए हमें 45 दिन में बरसे पानी को बाकी बचे हुए 320 दिन के लिए बचाकर रखने की जरूरत है. हमारे यहां जल स्रोतों की संख्या घटी है. जिन तालाबों को हमने पहले भरा देखा था, उनमें से कई लुप्त हो गए हैं. इसलिए हमें अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की जरूरत है. मोदी सरकार की महत्वाकाक्षी योजना में 2024 तक हर घर नल का जल को शामिल किया गया है. आजादी के 73 साल बाद भी देश में मात्र 18 प्रतिशत ग्रामीण आवासों तक ही पीने का पानी नल के माध्यम से पंहुचा था. इसे विस्तार देने की जरुरत है। अब 2024 तक शेष आवासों तक नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. सबसे खास बात यह है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत कई समाजसेवी संगठन वर्षा जल संचयन को लेकर आगे आये हैं और उन्‍होंने अपने इलाके के तस्वीर बदलने का काम किया है.

कहा जाता है कि एक बूंद पानी बचाना एक बूंद पानी बनाने के बराबर है. जल प्रहरीरियों ने इस दिशा में काम भी किया है. आज 3 हजार से 4 हजार त की आबादी के कई गांव ऐसे हैं, जहां प्रतिदिन ढाई लाख लीटर पानी रोज निकलता है. ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां गांव समिति ने इस पानी का शुद्धीकरण करके बागवानी में इस्तेमाल किया है. इससे गांव की वार्षिक आय 6-10 लाख तक बढ़ी है. जल शक्ति अभियान को जन आंदोलन बनाने के लिए ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया गया. ‘संचित जल और बेहतर कल’ थीम के साथ परंपरागत तालाबों और जलाशयों का संरक्षण, भू-जल रिचार्ज, वॉटर शेड डेवलपमेंट और वृक्षारोपण पर ज़ोर दिया गया. है आज अभियान को बनाये रखने है. जल का एक-एक बुंद जीवनदायिनी है. पानी के किफायती इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जाना जरुरी है. जल संरक्षण और जल संचयन कार्यक्रम का उद्देश्य है जल है तो कल है यह सिर्फ कहावत नहीं बल्कि जीवन के हकीक़त है. जिसे हम सबको समझना चाहिए.

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केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत कहते हैं, "कोरोना की वैश्विक महामारी के दौरान हमें जल संकट पर और गंभीरता से काम करना होगा. सरकार की योजनाएं तो चल रही हैं, लेकिन इसमें जन भागीदारी की आवश्‍यकता है. समाज को भी इस दिशा में गंभीरता से काम करने की जरूरत है. आज पर्यावरण और जल, दोनों हमारे लिए चुनौती बनकर उभरे हैं."

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