Jitiya Vrat Nahay Khay 2026 Wishes: जितिया व्रत नहाय-खाय के इन हिंदी WhatsApp Status, HD Images, GIF Greetings के जरिए दें शुभकामनाएं
संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना का लोकपर्व जीवितपुत्रिका यानी 'जितिया व्रत' इस वर्ष 2 अक्टूबर 2026 को नहाय-खाय के साथ शुरू होने जा रहा है. हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर माताओं द्वारा 24 घंटे का कठोर निर्जला उपवास रखा जाता है, जो इस साल शनिवार, 3 अक्टूबर को पड़ रहा है.
नई दिल्ली/पटना: पितृ पक्ष के दौरान आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाने वाला अत्यंत कठिन और आस्था से परिपूर्ण जीवितपुत्रिका (जितिया) व्रत इस वर्ष 2 अक्टूबर से शुरू हो रहा है. संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले इस त्रिदिवसीय अनुष्ठान की शुरुआत सप्तमी तिथि को 'नहाय-खाय' की परंपरा के साथ होगी.
बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल), झारखंड और पड़ोसी देश नेपाल में इस व्रत का विशेष सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व है. इस दौरान महिलाएं अन्न और जल की एक बूंद ग्रहण किए बिना करीब 24 घंटे तक निर्जला व्रत रखती हैं.
जितिया व्रत 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां
पंचांग गणना के अनुसार इस वर्ष जितिया पर्व का कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित है:
- नहाय-खाय (सप्तमी तिथि): शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026। इस दिन व्रती महिलाएं पवित्र नदियों या जलाशयों में स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करेंगी.
- जितिया निर्जला व्रत (अष्टमी तिथि): शनिवार, 3 अक्टूबर 2026। इस दिन मुख्य पूजा होगी और पूरे 24 घंटे का निर्जल उपवास रखा जाएगा.
- पारण (नवमी तिथि): रविवार, 4 अक्टूबर 2026। सूर्योदय के पश्चात विधिवत पूजा-अर्चना और दान के बाद व्रत का पारण किया जाएगा.
सोशल मीडिया पर नहाय-खाय की शुभकामनाओं का दौर
जितिया के नहाय-खाय के मौके पर लोग एक-दूसरे को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे वॉट्सऐप, फेसबुक और इंस्टाग्राम के माध्यम से डिजिटल संदेश भेजकर पर्व की बधाई दे रहे हैं:
- “आश्विन मास की अष्टमी को मां रखती है निर्जला उपवास, भगवान जीमूतवाहन पूरी करें संतान की हर आस। जितिया नहाय-खाय की हार्दिक शुभकामनाएं!”
- डिजिटल माध्यमों पर जितिया व्रत के पारंपरिक लोकगीत, एचडी वॉलपेपर्स और स्टिकर्स परिजनों और मित्रों के साथ साझा किए जा रहे हैं.
नहाय-खाय की परंपरा: 'मडुआ की रोटी और नोनी का साग' का महत्व
जितिया व्रत के पहले दिन नहाय-खाय का विशेष खान-पान वैज्ञानिक और पारंपरिक दृष्टि से जुड़ा है:
- सात्विक भोजन: सप्तमी के दिन महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-ध्यान कर भगवान जीमूतवाहन का स्मरण करती हैं और केवल एक बार शुद्ध सात्विक भोजन करती हैं.
- पारंपरिक व्यंजन: इस दिन विशेष रूप से मडुआ (रागी) की रोटी, नोनी (कुल्फा) का साग और दही-चूड़ा खाने का विधान है.
- माना जाता है कि नोनी के साग में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और पानी होता है, जो अगले दिन के लंबे निर्जला उपवास के दौरान शरीर में ऊर्जा और नमी बनाए रखने में मदद करता है.
- ओठगन/सरगी परंपरा: अष्टमी की भोर में सूर्योदय से पूर्व महिलाएं 'ओठगन' या सरगी खाती हैं, जिसके बाद निर्जला व्रत का संकल्प शुरू होता है.
पूजन विधि: भगवान जीमूतवाहन और चील्ह-सियारिन की कथा
अष्टमी के दिन शाम के समय महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करती हैं:
- प्रतीकात्मक स्थापना: मिट्टी या गाय के गोबर से चील्ह (चील) और सियारिन की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं. इसके साथ ही गंधर्व राजकुमार भगवान जीमूतवाहन की कुश (घास) की प्रतिमा बनाकर स्थापित की जाती है.
- पूजन सामग्री: भगवान को सरसों का तेल, सिंदूर, फल, बांस के पत्ते, खीरा, चना, पेड़ा, पान-सुपारी और 16 या 21 गांठों वाला जितिया का लाल धागा अर्पित किया जाता है.
- कथा श्रवण: महिलाएं महाभारत काल से जुड़ी राजा जीमूतवाहन और द्रोपदी के पुत्रों की रक्षा से संबंधित जितिया व्रत की पौराणिक कथा सुनती हैं. मान्यता है कि इस कथा को सुनने से संतान पर आने वाले बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं.
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, जितिया व्रत मातृत्व के अटूट प्रेम और त्याग का प्रतीक है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है.