भारत में लड़कों के खिलाफ यौन हिंसा पर क्यों नहीं होती खुलकर बात
भारत में लड़कों के साथ होने वाला यौन शोषण एक ऐसा विषय है, जिसपर शायद ही कभी खुलकर चर्चा होती है.
भारत में लड़कों के साथ होने वाला यौन शोषण एक ऐसा विषय है, जिसपर शायद ही कभी खुलकर चर्चा होती है. डीडब्ल्यू ने यह जानने की कोशिश की कि यौन शोषण से पीड़ित लड़कों पर इसका क्या असर होता है?इस रिपोर्ट में यौन शोषण के एक सर्वाइवर की आपबीती है.
भारत के दक्षिणी राज्य केरल में एक 16 वर्षीय लड़के ने बताया कि 14 पुरुषों ने दो साल से अधिक समय तक उसका यौन उत्पीड़न किया. किशोर, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लिए डिजाइन किए गए एक डेटिंग ऐप के माध्यम से उनके संपर्क में आया. खबरों के मुताबिक, पुलिस ने 14 पुरुषों के खिलाफ जांच शुरू कर दी है और कम-से-कम नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
इस घटना ने ऐसे देश में लड़कों के साथ होने वाली यौन हिंसा की ओर ध्यान खींचा है, जहां अक्सर महिलाओं पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई जाती है. विशेषज्ञों और यौन हिंसा से पीड़ित लोगों का मानना है कि यह मुद्दा भारत में एक वर्जित विषय बना हुआ है, जिसे शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है या इस पर चर्चा की जाती है.
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शर्म, चुप्पी और लांछन
डीडब्ल्यू ने यौन शोषण के सर्वाइवर एक 24 वर्षीय पुरुष से बात की. उन्होंने अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि कैसे उनके रिश्तेदारों ने युवावस्था में उनका 'शोषण' किया, जिनपर वह "भरोसा करते थे, जिनका आदर करते थे और जिन्हें अपना रक्षक समझते थे."
इस व्यक्ति ने कहा कि अपने साथ हुए दुर्व्यवहार पर चुप रहने का मुख्य कारण सामाजिक अपेक्षाओं का भारी दबाव था कि पुरुषों को मजबूत और चुप रहना चाहिए. उन्होंने कहा, "मर्दानगी के बारे में समाज की यह धारणा है कि अगर कोई पुरुष अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बोलता है या आवाज उठाता है, तो वह अपनी मर्दानगी या पौरुष खो देता है."
समाजशास्त्री विजयलक्ष्मी बरारा ने डीडब्ल्यू को बताया कि पुरुषों को पीड़ित के रूप में स्वीकार करने में संकोच या हिचकिचाहट इसलिए है, क्योंकि समाज में मर्दानगी को लेकर पारंपरिक धारणाएं अपनी जड़ें जमा चुकी हैं. इन पारंपरिक धारणाओं के अनुसार, पुरुषों को हमेशा हावी और शक्तिशाली माना जाता है, कमजोर या पीड़ित नहीं.
बरारा ने कहा, "मर्दानगी की पारंपरिक धारणाओं के तहत पुरुषों को मजबूत और श्रेष्ठ माना जाता है. इस वजह से यह स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है कि पुरुष भी कमजोर हो सकते हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा सकता है."
विजयलक्ष्मी बरारा ने बताया कि आमतौर पर पुरुषों के पीड़ित होने की बात को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता. पितृसत्तात्मक समाज या तो इस बात को स्वीकार नहीं कर पाता है, या जानबूझकर ऐसा नहीं करना चाहता है. यहां तक कि यह कल्पना भी नहीं कर पाता है कि पुरुष और लड़के भी इस तरह के अपराधों के शिकार हो सकते हैं.
विजयलक्ष्मी बरारा ने आगे कहा, "समाज में पूरी तरह यह धारणा बन गई है कि सिर्फ महिलाएं ही इन अपराधों की पीड़ित होती हैं. इस वजह से पुरुषों के उत्पीड़न से जुड़ी घटनाओं, उनके अनुभवों और उनकी पीड़ा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है."
डीडब्ल्यू के साथ बात करने वाले पीड़ित पुरुष ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया, "कोई भी कल्पना नहीं करता है कि किसी लड़के के साथ दुर्व्यवहार हो सकता है. जब कोई लड़का यौन शोषण का आरोप लगाता है, तो अक्सर उसका मजाक उड़ाया जाता है."
भारत के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से 2007 में किए गए एक राष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि आधे से ज्यादा लड़कों ने यौन शोषण का सामना किया है. लगभग एक-चौथाई ने गंभीर यौन शोषण का अनुभव किया है.
हालांकि, इस अध्ययन में सुविधा-आधारित नमूने का इस्तेमाल किया गया है, न कि प्रतिनिधित्व करने वाले नमूने का. इस वजह से इन आंकड़ों को सावधानी से देखा जाना चाहिए. फिर भी यह एक सच है कि यह समस्या हर जगह फैली हुई है.
पुरुष सर्वाइवरों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है
नंदिनी भट्टाचार्य, यौन हिंसा से गुजरे पुरुषों के लिए काम करती हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि ऐसे पुरुषों को अलग तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसमें गहरी शर्म और अकेलापन शामिल है. यह मुख्य रूप से इस वजह से बढ़ता है कि लोग उनकी आपबीती पर आसानी से विश्वास नहीं करते हैं.
वह समझाती हैं कि ऐसे पुरुषों को 'विक्टिम ब्लेमिंग' (पीड़ित को ही दोषी ठहराने) की मानसिकता से उबरना पड़ता है. यह पारंपरिक लैंगिक मानदंडों से जुड़ा हुआ है. इन मानदंडों के हिसाब से समाज में पुरुषों को कमाने वाला और रक्षा करने वाला माना जाता है. जबकि, महिलाओं को कमजोर और नाजुक समझा जाता है.
नंदिनी भट्टाचार्य ने बताया, "इस वजह से अपराधबोध, खुद को दोष देने और घबराहट की भावनाएं काफी बढ़ जाती हैं. इसके साथ ही वे अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते. इन सब का नतीजा यह होता है कि वे चुप रहते हैं और मदद मांगने या उत्पीड़न की रिपोर्ट करने से हिचकिचाते हैं."
नारीवादी लेखिका यशोधरा राय चौधरी कहती हैं कि चुप्पी की इस संस्कृति का मतलब यह भी है कि दुर्व्यवहार पर चर्चा में लड़कों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. उन्होंने कहा, "आम धारणाओं के विपरीत लड़कों को भी लड़कियों के बराबर ही दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है. कुछ मामलों में तो दुर्व्यवहार करने वालों में महिलाएं शामिल होती हैं."
यशोधरा राय चौधरी ने बताया कि कई पुरुष ऐसे अनुभवों को सालों बाद, वह भी अकेले में ही जाहिर करते हैं. इससे पता चलता है कि सामाजिक वर्जनाओं का सामना करना और पारंपरिक लैंगिक सीमाओं से ऊपर उठकर उत्पीड़न के बारे में समझ बढ़ाना कितना जरूरी है.
लिंग की परवाह किए बिना बच्चों की सुरक्षा
यशोधरा राय चौधरी ने कहा कि बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए, प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट (पॉक्सो अधिनियम) जैसे कारगर और ज्यादा जेंडर-न्यूट्रल कानूनों की जरूरत है. इससे लड़के हों या लड़कियां, सभी बच्चों की सुरक्षा की जा सकेगी.
उन्होंने बताया, "किसी भी इंसानी शरीर को पहुंचाया गया कोई भी नुकसान या उसके साथ किसी तरह का शारीरिक दुर्व्यवहार हर हाल में निंदनीय होना चाहिए, फिर चाहे मामला या लिंग कुछ भी हो."