भारत की सड़कों पर म्यूरल बनाना महिलाओं के लिए कैसा अनुभव है?
दिल्ली के पहले ओपन पब्लिक आर्ट डिस्ट्रिक्ट में दसवां आर्ट फेस्टिवल चल रहा है.
दिल्ली के पहले ओपन पब्लिक आर्ट डिस्ट्रिक्ट में दसवां आर्ट फेस्टिवल चल रहा है. यहां देश-विदेश से कई कलाकार दीवारों पर म्यूरल बनाने आए हैं. लेकिन महिला कलाकारों के लिए यह काम कई अतिरिक्त चुनौतियों से भरा है.दिल्ली का पहला पब्लिक आर्ट डिस्ट्रिक्ट 'लोधी आर्ट डिस्ट्रिक्ट' अपने 10 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है. हर साल की तरह इस साल भी लोधी आर्ट फेस्टिवल मनाया जा रहा है. एक फरवरी से लेकर 28 फरवरी तक चलने वाले इस फेस्टिवल में पोलैंड, जर्मनी, अर्जेंटीना, स्पेन और लंदन के कलाकार आ रहे हैं, जो अपनी कला के जरिए एक खास संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं.
इस साल फेस्टिवल की थीम है, "डायलेट ऑल आर्ट स्पेसेस.” जिसका मतलब हुआ कला को हर जगह फैलाना और उसे अपनी जिंदगी के हिस्से जैसा देखना. इस फेस्टिवल का मकसद यह दिखाना है कि कला सिर्फ दीवारों पर ही नहीं, बल्कि पेड़ों, दरवाजों और इमारतों के हर हिस्से में हो सकती है. जिससे हर छाया, पेड़, जानवर और रौशनी उस कला का हिस्सा बन जाते हैं. इस साल यहां छह नए म्यूरल (दीवारों पर बड़ी पेंटिंग) बनाए जा रहे हैं.
दरवाजे के बीच "जादुई” दुनिया
फेस्टिवल में भाग लेने वाली बर्लिन की महिला कलाकार, जुमु (जुरेना) दिल्ली की सड़कों पर रंगों से सनी पैंट पहने, बालों में रंग-बिरंगे पॉम-पॉम लगाए दीवारों को रंगों से भरने की कोशिश में लगी हैं. पिछले पांच दिनों में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर काफी हद तक अपने म्यूरल को आकार दे दिया है. दिल्ली में अपने अनुभवों पर जुमु कहती हैं, "यहां मैं सच में काफी प्रदूषण महसूस कर सकती हूं. इसकी अभ्यस्त होने में मुझे दो-तीन दिन लगे. हालांकि, अब मैं केरल में समुद्र के पास जाने का बेसब्री से इंतजार कर रही हूं.”
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उनके म्यूरल में जो सबसे अनोखा है, वह है "जादुई” शब्द, जो कि बीचों-बीच लिखा है. जिस दीवार पर यह शब्द लिखा है, उसके ऊपर सर्दी की धूप में दो कबूतर बैठे चोंच लड़ा रहे हैं. इस नजारे को देख जुमु उछल कर बोलती हैं, "यह वाकई जादुई है.”
यह दरवाजा एक रास्ता दिखाता है, जिससे हर दिन लोग गुजरते हैं. जुमु कहती हैं, "मेरे लिए यह दरवाजा प्रवासन और सीमा पार करने से जुड़ा है. जब आप अपनी संस्कृति को साथ लेकर चलते हैं, भले ही सीमाएं बदल जाएं.” जुरेना अपनी कला के जरिए अपने पूर्वजों, प्रवासन के दौर और अपनी विरासत को याद करती हैं. वह कहती हैं, "मैं एक कलाकार हूं और मेरी कला प्रवासन, यादों और उन पूर्वजों की विरासत से आती है, जो हमारे साथ-साथ यात्रा करती है.”
माथे की बिंदी हिम्मत की निशानी
हालांकि जुरेना जर्मनी में पैदा हुई हैं, लेकिन उनके माता-पिता अब्या याला (पेरू और चिली) से जर्मनी आए थे. वह कहती हैं, "यह पेंटिंग जुड़ाव के बारे में है, दूर-दराज के इलाकों के लोगों को जोड़ने के बारे में है.” उनकी पेंटिंग में कई महिलाएं है. यह महिलाएं अलग-अलग देशों से हैं. यह तस्वीरें महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन को दिखाती हैं, जो कभी बाजार में काम करती हैं, तो कभी घरों में. कैसे वह इन सबके बीच चुपचाप लेकिन मजबूती से आगे बढ़ती हैं.
वह कहती हैं, "मेरी जड़ें लैटिन-अमेरिका से जुड़ी हैं. राजनीतिक माहौल के कारण मेरे माता-पिता ने जर्मनी में शरण ली थी. यहां मेरी मां बच्चों की देखभाल का काम करती थीं. इसलिए जाहिर है कि मेरा देखने का एक अलग नजरिया है, क्योंकि मैं दो संस्कृतियों के बीच बड़ी हुई हूं.”
उन्हें अलग-अलग संस्कृतियों में काम करने से समाज की असलियत का अंदाजा होता है. उनका कहना है, "जब आप सड़कों पर लोगों से बात करते हैं, तो आपको संस्कृति की असली हकीकत दिखती है. लोग काम से घर लौटते हुए, परिवारों के साथ बैठे हुए दिखते हैं. एक पर्यटक के रूप में आप सिर्फ सतह देखते हैं, लेकिन कलाकार के रूप में आप लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी के भीतर झांक पाते हैं.”
इसके अलावा, पेंटिंग में अलग-अलग दिखने वाली इन महिलाओं के बीच एक जुड़ाव है, जो कि उनकी संस्कृतियों से आता है. यह महिलाएं अब्या याला और भारत की महिलाओं से प्रेरित हैं, जो माथे पर बिंदी और बालों में फूल लगाए हुए हैं. यह सुंदरता, आध्यात्मिकता, मजबूती और सुरक्षा की निशानी है. साथ ही, पेंटिंग में बार-बार दिखने वाला गुड़हल का फूल, जो कि कोमलता, जीवन शक्ति और भक्ति को दिखाता है. जुमु का कहना है, "यह फूल भी तेज धूप (मुश्किल हालात) में खिलता है, बिल्कुल इन महिलाओं की तरह.”
सड़कों पर काम करना कितना मुश्किल
अपनी जिंदगी को भी वह इसी नजरिए से देखती हैं. सड़कों पर काम करना कई बार मुश्किल हो जाता है, लेकिन वह हार नहीं मानती हैं. वह बताती हैं, "मैं खुद को मानसिक रूप से मजबूत मानती हूं और आमतौर पर अपने काम पर ध्यान देती हूं. लोग कई बार मुझे सावधान रहने को कहते हैं, लेकिन मेरे साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ है.”
हालांकि, सार्वजनिक जगहों पर पुरुषों की निगाहें उन्हें अक्सर परेशान करती हैं. वह बताती हैं, "कुछ पल ऐसे होते हैं, जब पुरुष बहुत घूरते हैं. जर्मनी में भी लोग मुझे देखते हैं, क्योंकि मैं अलग दिखती हूं. लेकिन यहां कभी-कभी यह नजरें मुझे बेचैन कर देती हैं. वह मेरे अतरंगे कपड़ों से हटकर कभी-कभी कुछ सेक्सुअल महसूस होने लगती हैं.”
लेकिन वह सकारात्मक नजरिए के साथ जीना पसंद करती हैं. पुरुष-प्रधान कला समाज में वह खुद को लड़कियों के लिए एक मिसाल के तौर पर देखती हैं. अलग-अलग देशों में वह कलाकार बनने का सपना रखने वाली लड़कियों के साथ समय गुजारती हैं और उन्हें आगे बढ़ने की सलाह देती हैं. हालांकि, महिला कलाकार के लिए यह जीवन काफी कठिन हो सकता है. वह कहती हैं, "आयोजक यह नहीं सोचते कि कलाकारों को भी टॉयलेट जाना पड़ता है. इसलिए मैं हमेशा पहले से ही अपना इंतजाम कर लेती हूं. जैसे एक ही जगह खाना या कॉफी पीना, ताकि वह मुझे पहचान लें और अगर मैं सिर्फ वॉशरूम के लिए भी जाऊं, तो वह समझ जाएं और इंकार न करें.”