पश्चिम बंगाल-पहले चरण के मतदान में निगाहें चाय मजदूरों पर

पश्चिम बंगाल का चाय उद्योग पूरी दुनिया में मशहूर है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

पश्चिम बंगाल का चाय उद्योग पूरी दुनिया में मशहूर है. अब विधानसभा के पहले चरण के चुनाव में भी तमाम निगाहें इन बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों पर टिकी हैं. करीब 35 सीटों पर इनके वोट निर्णायक हैं.उत्तर बंगाल के नाम से मशहूर इस इलाके में विधानसभा की 54 सीटें हैं. उनमें से 35 सीटें दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरदुआर जिले में हैं. इस इलाके में स्थित करीब साढ़े आठ सौ चाय बागानों में 15 लाख मजदूर काम करते हैं. राज्य का चाय उद्योग लंबे अरसे से विभिन्न वजहों से बदहाली के दौर से गुजर रहा है. इलाके में कई बागान अरसे से बंद पड़े हैं और मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के अलावा कई मौलिक सुविधाओं की कमी से भी जूझना पड़ रहा है.

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अपनी समस्याओं के समाधान की आस लेकर यह लोग हर बार एकजुट होकर किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी का समर्थन करते हैं. लेकिन आखिर में उनको निराशा ही हाथ लगती है. यही वजह है कि कुछ साल के अंतराल पर इन मजदूरों की निष्ठा बदलती रहती है. यही राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की चिंता और सत्ता की दावेदार बीजेपी के लिए उम्मीद की बड़ी वजह है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब बागान मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और उनको भविष्य निधि के दायरे में शामिल करने का भरोसा दिया है. इसके साथ ही सबको जमीन का मालिकाना हक देने की बात भी कही जा रही है. बीजेपी भी ऐसे ही वादे कर रही है. लेकिन मजदूरों को अब राजनीतिक दलों के दावों पर भरोसा नहीं रहा.

बदहाली और पलायन

चाय बागानों में सुविधाओं और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण इन मजदूरों के बच्चे अब बेहतर अवसरों की तलाश में पलायन कर रहे हैं. यह मजदूर पहले पीढ़ी दर पीढ़ी बागानों में काम करते थे. लेकिन अब नई पीढ़ी महानगरों की ओर जा रही है.

अलीपुरदुआर के एक बागान में काम करने वाली सुनीता हेम्ब्रम डीडब्ल्यू से कहती हैं, "हमें रोजाना ढाई सौ रुपये मजदूरी मिलती है. इसमें घर और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलाना मुश्किल है. इसके अलावा पीने के पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है. इसलिए हमारे बच्चे कमाने के लिए दूसरे शहरों में जा रहे हैं. हम नहीं चाहते कि वो बागान में काम करें."

एक अन्य बागान मजदूर संजीत उरांव डीडब्ल्यू को बताते हैं, "बागान में बनी हमारी आवासीय कालोनी में अब भी शौचालयों की कमी है. चुनाव से पहले तमाम राजनीतिक दल कई आकर्षक वादे करते हैं. लेकिन चुनाव बाद फिर किसी को कुछ याद नहीं रहता."

वो बताते हैं कि राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ कुछ लोगों को ही मिल रहा है. इसी तरह पांच साल पहले बीजेपी ने इलाके के बंद बागानों को खोलने का वादा किया था. लेकिन अब तक कोई प्रगति नहीं हो सकी है.

उनका कहना था, "बागान मजदूरों के बच्चे अब यहां काम करने की बजाय बड़े शहरों में जाकर मजदूरी कर रहे हैं. वहां उनको रोजाना आठ सौ से एक हजार रुपये मिल जाते हैं. लेकिन बागान में कड़ी मेहनत के बावजूद हमें 250 रुपये ही मिलते हैं."

राजनीतिक लिहाज से अहम

खासतौर पर बीजेपी के लिए मतदान का पहला दौर बेहद अहम है. वर्ष 2021 के चुनाव में में उसने जो 77 सीटें जीती थी उनमें से 59 उसे इसी इलाके में मिली थी. अब उसके सामने पहले दौर में उन सीटों को बरकरार रखना या दायरा बढ़ाने की चुनौती है.

इलाके की इन सीटों के नतीजे राज्य सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. लेकिन चाय बागान मजदूर कुछ साल के अंतराल पर निष्ठा बदलते रहे हैं. ट्रेड यूनियन आंदोलन मजबूत होने की वजह से लंबे समय तक यह इलाके वाममोर्चा का गढ़ रहे थे. लेकिन 2011 के बाद यहां मजदूरों का रुझान बदला और वो तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में उतरने लगे. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में में तृणमूल कांग्रेस ने इलाके की 54 में से 28 सीटें जीती थी. वर्ष 2016 में भी इलाके में पार्टी का दबदबा कायम रहा.

लेकिन वर्ष 2019 में तस्वीर तेजी से बदली. उस साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इलाके की आठ में से सात लोकसभा सीटें जीत कर अपना वर्चस्व कायम कर लिया. वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य के बाकी हिस्सों में बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम रहने के बावजूद उसने 30 सीटें जीत कर अपना वर्चस्व कायम रखा था.

उस साल तृणमूल को 24 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने लोकसभा की आठ में से छह सीटों पर कब्जा बरकरार रखा था.

मुद्दे क्या हैं?

इस बार भी पहले की तरह न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि, जमीन का मालिकाना हक और बंद बागान ही प्रमुख मुद्दा हैं. तृणमूल कांग्रेस ने एसआईआर के तहत हजारों बागान मजदूरों के नाम मतदाता सूची से कटने को भी मुद्दा बनाया है. पार्टी अपने अभियान में राज्य सरकार की ओर से मजदूरों के हित में शुरू की गई योजनाओं के फायदे गिना रही है.

दूसरी ओर, बीजेपी ने इस उद्योग की बदहाली के लिए सत्तारूढ़ पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हुए मजदूरों का जीवनस्तर सुधारने के लिए कई वादों के साथ मैदान में है. पार्टी ने इस चुनाव को मजदूरों के अस्तित्व की लड़ाई करार दिया है.

उत्तर बंगाल में कोच-राजबंशी और कामतापुरी समुदाय कम से कम 10 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं. राजबंशी समुदाय की गिनती राज्य में अनुसूचित जनजाति की सबसे बड़ी आबादी के तौर पर होती है. पहचान के सवाल पर इस इलाके में अलग राज्य की मांग में आंदोलन भी होते रहे हैं.

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में बीजेपी और तृणमूल अपने स्थानीय सहयोगियों पर निर्भर हैं. तृणमूल कांग्रेस ने जहां भारतीय जनमुक्ति मोर्चा के साथ हाथ मिलाते हुए तीनों सीटें उसके लिए छोड़ दी हैं वहीं बीजेपी ने भी गोरखा मुक्ति मोर्चा के साथ तालमेल किया है. कभी अलग गोरखालैंड की मांग में सुर्खियां बटोरने वाले दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अब इस आंदोलन की गूंज नहीं सुनाई देती. इस मांग में आंदोलन करने वाली स्थानीय पार्टियां भी कई गुटों में बंट चुकी हैं.

देश में मुस्लिम आबादी के लिहाज से सबसे बड़े जिले मुर्शिदाबाद और उससे सटे मालदा में भी पहले चरण में ही मतदान होना है. वर्ष 2021 में मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थी और दो बीजेपी ने. लेकिन एसआईआर के कारण जिले में साढ़े चार लाख से ज्यादा वोटरों के नाम कटने से तृणमूल की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

मालदा जिले के 12 में से पिछली बार आठ सीटें तृणमूल को मिली थी और चार बीजेपी को. कभी कांग्रेस का गढ़ रहे इस जिले में पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका था. एसआईआर के कारण करीब 2.40 लाख वोटरों के नाम कटने की वजह से इस बार बीजेपी को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है और कांग्रेस को खाता खुलने की.

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार सिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "उत्तर बंगाल इलाके की विविधता और अहमियत को ध्यान में रखते हुए मतदान का पहला चरण सत्ता के दावेदारों के लिए काफी महत्वपूर्ण है. इस बार बीजेपी जहां अपनी सीटों की तादाद बढ़ाने का प्रयास कर रही है वहीं तृणमूल कांग्रेस अपने पैरों तले खिसकी जमीन पर अंकुश लगाने के लिए मैदान में है. मतदान का पहला चरण ही राज्य में अगली सरकार की दशा-दिशा तय करेगा."

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