SC/ST Act Ruling: बंद कमरे में जातिसूचक शब्द कहना एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की स्कूल मैनेजर के खिलाफ कार्यवाही
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि बंद कमरे या चारदीवारी के भीतर जातिसूचक शब्द कहना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि कानून के अनुसार ऐसा कृत्य 'सार्वजनिक दृष्टि' के भीतर होना अनिवार्य है.
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 ( Scheduled Castes and the Scheduled Tribes Prevention of Atrocities Act) के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति पर चारदीवारी या बंद कमरे के भीतर जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप है, जहां आम जनता उपस्थित नहीं थी, तो यह एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक स्कूल प्रबंधक (मैनेजर) के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही को खत्म करने से इनकार कर दिया गया था. यह भी पढ़ें: NEET Student Protests: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की जांच के लिए बनाई 5 सदस्यीय समिति
क्या था पूरा मामला?
Live Law की रिपोर्ट और Scroll.in की रिपोर्ट के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 24 जनवरी 2020 को अपने बेटे के झगड़े के सिलसिले में वह स्कूल प्रबंधक से मिलने गया था.
- आरोप: शिकायतकर्ता का दावा था कि स्कूल मैनेजर और अन्य कर्मचारियों ने उसके साथ लाठियों से मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं.
- दर्ज धाराएं: पुलिस ने दंगा, चोट पहुंचाने, बंधक बनाने, अपमानित करने की धाराओं के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत एफआईआर दर्ज की थी.
आरोपी पक्ष की दलील
स्कूल मैनेजर ने कार्यवाही को चुनौती देते हुए अदालत में दलील दी कि कथित घटना स्कूल के एक बंद कमरे (Room A) के भीतर हुई थी.
- वह कमरा चारों तरफ से बंद था, उसमें कोई खिड़की नहीं थी और वह आम जनता के लिए खुला नहीं था.
- गवाहों (शिक्षकों) के बयानों में केवल कहासुनी और हाथापाई की बात कही गई थी, लेकिन किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा कि वे कमरे के अंदर मौजूद थे या उन्होंने जातिसूचक शब्द सुने थे.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: 'पब्लिक व्यू' का मतलब क्या है?
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी स्थान को 'सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में' (Within Public View) तभी माना जा सकता है जब आम जनता के लोग उस घटना को देख या सुन सकते हों.
पीठ ने टिप्पणी की:
"यदि कथित अपराध चारदीवारी के भीतर होता है जहां आम लोग मौजूद नहीं हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह कृत्य सार्वजनिक दृष्टि के भीतर हुआ है."
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि शिक्षकों का स्कूल परिसर में मौजूद होना मात्र यह साबित नहीं करता कि कथित टिप्पणी सार्वजनिक रूप से की गई थी.
अन्य धाराओं में जारी रहेगा मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी स्कूल प्रबंधक के खिलाफ केवल एससी/एसटी एक्ट के तहत की गई कार्यवाही को निरस्त किया गया है. मारपीट, दंगा, बंधक बनाने और जानबूझकर अपमानित करने से जुड़ी अन्य भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के तहत दर्ज मामले में सुनवाई जारी रहेगी.