Bombay High Court: 'मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल कर रहे हैं'; बॉम्बे हाईकोर्ट ने तुकाराम मुंढे के नेतृत्व वाले महाराष्ट्र FDA को लगाई फटकार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने दवा कंपनी कैडिला फार्मास्यूटिकल्स की याचिका पर सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के काम करने के तरीके पर कड़ी टिप्पणी की है. अदालत ने बिना पक्ष सुने की गई एकतरफा कार्रवाई पर कहा कि एजेंसी "मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल" कर रही है.
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने मंगलवार (11 अगस्त) को महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (Maharashtra Food and Drug Administration) (FDA) द्वारा की जा रही कठोर और अचानक दंडात्मक कार्रवाइयों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की. अदालत ने नियामक संस्था को फटकार लगाते हुए कहा कि वह "मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल" कर रही है और उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना ही सीधे बड़ी कार्रवाई कर रही है.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting CJ) रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ दवा कंपनी कैडिला फार्मास्यूटिकल्स (Cadila Pharmaceuticals) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में एफडीए द्वारा ब्रांडिंग समानताओं के आधार पर दवाओं की बिक्री पर लगाए गए राज्यव्यापी प्रतिबंध और स्टॉक जब्ती को चुनौती दी गई थी.
अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बाद एफडीए ने फार्मास्यूटिकल कंपनी के खिलाफ अपने आदेश वापस लेने, कारण बताओ नोटिस जारी करने और अंतिम आदेश पारित करने से पहले कंपनी को औपचारिक सुनवाई का अवसर देने पर सहमति जताई है. यह भी पढ़ें: इनकम टैक्स छूट पर बॉम्बे हाई कोर्ट में सुनवाई: कानूनी मान्यता के बिना समलैंगिक जोड़ों को नहीं मिल सकता 'पति-पत्नी' वाला टैक्स लाभ
कैडिला फार्मास्यूटिकल्स का मामला और अदालत की चिंताएं
कैडिला फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड ने अपनी कुछ प्रमुख दवाओं—एसिलॉक 150, एसिलॉक 150 प्लस, एसिलॉक 300 और एसिलॉक 300 प्लस—के वितरण और बिक्री पर एफडीए की रोक के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था. एफडीए ने महाराष्ट्र भर में कंपनी का लगभग 2.45 करोड़ रुपये का स्टॉक भी जब्त कर लिया था.
कंपनी का तर्क था कि यह दंडात्मक कार्रवाई उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना ही एकतरफा रूप से की गई है. वहीं, सरकारी वकील नेहा भिड़े ने नियामक का बचाव करते हुए कहा कि दवाओं की ब्रांडिंग में समानता के कारण भ्रम की स्थिति बन रही थी, और यह कार्रवाई किसी मनमानी के तहत नहीं बल्कि एहतियात के तौर पर की गई थी.
हालांकि, पीठ ने अचानक दवाओं पर प्रतिबंध लगाने के फैसले के व्यापक जन-प्रभाव पर गहरी चिंता जताई. अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका ध्यान कंपनियों के नुकसान से ज्यादा मरीजों की भलाई और स्वास्थ्य पर है. अदालत ने कहा, "हमें कंपनी को पिछले हफ्तों में हुए नुकसान की कोई चिंता नहीं है. हमें उन लोगों की चिंता है जिनकी इन जरूरी दवाओं तक पहुंच बाधित हो गई है."
'पहले गोली मारो' जैसी कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
अदालत ने इसी तरह की कई याचिकाओं के बढ़ते मामलों का हवाला देते हुए एफडीए को उसके प्रवर्तन (Enforcement) शैली को लेकर कड़ी चेतावनी दी.
पीठ ने टिप्पणी की, "आपके (FDA) पास तलवार इस्तेमाल करने की शक्ति है, लेकिन समस्या यह है कि आप इसका इस्तेमाल एक मच्छर को मारने के लिए कर रहे हैं. शक्ति का इस्तेमाल विवेकपूर्ण और उचित तरीके से होना चाहिए. होटल और रेस्तरां के मामलों में भी आप पहले गोली मारते हैं और फिर सवाल पूछते हैं."
गौरतलब है कि इससे पहले भी हाईकोर्ट ने इसी तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अमेज़न रिटेल इंडिया (Amazon Retail India) के गोदाम के खिलाफ की गई एफडीए की सख्त कार्रवाई की कड़ी आलोचना की थी.
मई में आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे के कार्यभार संभालने के बाद से ही एफडीए ने नियमों के उल्लंघन के आरोप में रेस्तरां और खाद्य प्रतिष्ठानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की है. अदालत ने नियामक उल्लंघनों पर सख्ती को जरूरी तो माना, लेकिन स्पष्ट किया कि किसी भी प्रतिष्ठान को अचानक बंद करने के बजाय एक व्यवस्थित और कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए.
सरकारी वकील द्वारा कैडिला के खिलाफ विवादित आदेशों को वापस लेने और उचित प्रक्रिया का पालन करने के आश्वासन के बाद उच्च न्यायालय ने इस याचिका का निपटारा कर दिया.