मुंबई: देश में समलैंगिक जोड़ों (Same-Sex Couples) को कानूनी और आर्थिक अधिकार दिए जाने की मांग के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ सामने आया है. आयकर विभाग (Income Tax Department) ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि समलैंगिक जोड़े तब तक आयकर अधिनियम के तहत मिलने वाली 'जीवनसाथी कर छूट' (Spousal Tax Exemption) का दावा नहीं कर सकते, जब तक कि उनके विवाह को देश के कानून के तहत वैध मान्यता न मिल जाए. यह दलील केंद्र सरकार की ओर से उस याचिका के जवाब में दी गई है, जिसमें समलैंगिक जोड़ों (Heterosexual Spouses) के बीच मिलने वाले उपहारों (Gifts) पर टैक्स लगाने के प्रावधान को चुनौती दी गई है. यह भी पढ़ें: Extortion Case Against Wife: पत्नी ने दूसरी शादी के बाद किया ये गंदा काम तो दर्ज हो सकता है फिरौती का मामला
क्या है याचिकाकर्ताओं की दलील?
यह पूरा मामला सामाजिक कार्यकर्ता पेइयो अशिहो और उनके पार्टनर विवेक दीवान द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है. दोनों ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर मांग की है कि आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) के तहत मिलने वाले जीवनसाथी टैक्स लाभ के दायरे में समलैंगिक जोड़ों को भी शामिल किया जाए.
मौजूदा कानून के तहत, यदि किसी व्यक्ति को अपने रिश्तेदारों या जीवनसाथी से 50,000 रुपये से अधिक मूल्य का उपहार या संपत्ति मिलती है, तो उस पर टैक्स नहीं लगता है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह छूट केवल विपरीतलिंगी (Heterosexual) जोड़ों को दिए जाने के कारण कानून उनके साथ असमान व्यवहार करता है. यह उनके संवैधानिक समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि 'जीवनसाथी' (Spouse) शब्द की व्याख्या इस तरह की जाए जिससे समलैंगिक पार्टनर्स को भी यह लाभ मिल सके.
कानूनी मान्यता के बिना समलैंगिक जोड़ों को नहीं मिल सकता 'पति-पत्नी' वाला टैक्स लाभ
The Income Tax Department recently told the Bombay High Court that same-sex couples cannot claim benefits available to a "spouse" under the Income Tax Act, 1961, unless their relationship is recognised as a valid marriage under the law.
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— Live Law (@LiveLawIndia) July 9, 2026
अदालत में सरकार और आयकर विभाग का पक्ष
केंद्र सरकार और आयकर विभाग ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है. विभाग का कहना है कि भारतीय विवाह कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं है. कानून में 'रिश्तेदार' और 'जीवनसाथी' की परिभाषाएं स्पष्ट हैं और अदालत अपने आदेश के जरिए टैक्स कानून के इस दायरे को नहीं बढ़ा सकती है.
सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट के साल 2023 के ऐतिहासिक 'सुप्रियो बनाम भारत संघ' मामले का हवाला दिया. इस फैसले में देश की शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने माना था कि समलैंगिक यूनियनों को कानूनी मान्यता देने या न देने का अधिकार पूरी तरह संसद (विधायिका) के पास है और अदालतें इसके लिए न्यायिक निर्देश जारी नहीं कर सकती हैं। आयकर विभाग के अनुसार, जब तक संसद कानून में बदलाव नहीं करती, तब तक इस छूट को समलैंगिक जोड़ों पर लागू नहीं किया जा सकता.
अंतरिम राहत देने से हाई कोर्ट का इनकार
इससे पहले, नवंबर 2025 में सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस जोड़े को किसी भी तरह की अंतरिम राहत (Interim Relief) देने से इनकार कर दिया था. अदालत ने टिप्पणी की थी कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाया गया कथित भेदभाव का मुद्दा सीधे तौर पर मौजूदा कानून की बनावट से उपजा है, न कि अदालत की अपनी किसी प्रक्रिया से। पीठ ने कहा था कि वह याचिकाकर्ताओं को उनकी कर देनदारी (Tax Liability) से बचाने के लिए कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं कर सकती, हालांकि यदि वे भविष्य में यह केस जीत जाते हैं, तो उनके द्वारा चुकाया गया टैक्स रिफंड (वापस) कर दिया जाएगा.
मामले का बैकग्राउंड और आगे की राह
यह याचिका मूल रूप से अगस्त 2025 में दायर की गई थी, जिसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के अपने फैसले में विवाह का अधिकार तो नहीं दिया था, लेकिन सरकार को निर्देश दिया था कि वह क्वीर जोड़ों को राशन कार्ड, संयुक्त बैंक खाते, पेंशन और उत्तराधिकार जैसे आर्थिक लाभ देने की संभावनाओं की जांच करने के लिए एक कैबिनेट सचिव स्तर की समिति का गठन करे.
हाल ही में, 8 जुलाई 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले की विस्तृत संवैधानिक सुनवाई के लिए 30 जुलाई 2026 की तारीख तय की है और स्पष्ट किया है कि अब इस मामले को आगे नहीं टाला जाएगा. दोनों पक्ष इस तारीख को अदालत के सामने अपनी अंतिम और विस्तृत दलीलें पेश करेंगे.













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