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सुप्रीम कोर्ट ने एक समान शादी की उम्र, तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को शादी की उम्र, तलाक, भरण-पोषण, गोद लेने, उत्तराधिकार और सभी समुदायों के लिए विरासत में एकरूपता की मांग करने वाली अलग-अलग जनहित याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने एक समान शादी की उम्र, तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार की याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट (Photo Credit : Twitter)

नई दिल्ली, 6 सितम्बर : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को शादी की उम्र, तलाक, भरण-पोषण, गोद लेने, उत्तराधिकार और सभी समुदायों के लिए विरासत में एकरूपता की मांग करने वाली अलग-अलग जनहित याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया. प्रधान न्यायाधीश यू.यू. ललित और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट ने सवाल किया कि क्या कानून बनाने के संबंध में विधायिका को परमादेश जारी किया जा सकता है. हालांकि, एक हस्तक्षेपकर्ता के वकील ने शीर्ष अदालत से याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह करते हुए कहा कि अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा समान याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसमें समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मसौदा तैयार करने के निर्देश देने वाली याचिका भी शामिल थी, जिसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर किया गया था और एससी को ट्रांसफर किए जाने की मांग की गई थी.

इस पर चीफ जस्टिस ललित ने कहा: "हां, मैं मानता हूं कि ये सभी यूसीसी के विभिन्न पहलू, घटक हैं." केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा. हस्तक्षेपकर्ता के वकील ने अदालत से याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह किया. उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि उनकी पहले की याचिका यूसीसी से संबंधित थी, जिसे विधि आयोग को एक प्रतिनिधित्व देने के लिए वापस ले लिया गया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि यहां दी गई दलीलों से यह प्रतीत होता है कि इस अदालत में एक जैसे मुद्दे लंबित हैं. पीठ ने कहा, इस तरह की याचिकाओं का विवरण याचिकाकर्ता द्वारा सुनवाई की अगली तारीख तक रिकॉर्ड पर रखा जा सकता है और केंद्र से मामले में अपना जवाब दाखिल करने को कहा. याचिकाओं में तलाक, गुजारा भत्ता और भरण-पोषण के लिए एक समान आधार की मांग की गई और विभिन्न समुदायों में प्रचलित भेदभावपूर्ण प्रक्रिया को हटाया गया, जो समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. यह भी पढ़ें : UP: लखनऊ का होटल लेवाना आग के कारण हुई मौतों के बाद हुआ सील, अब होगी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई

शीर्ष अदालत ने पहले सभी समुदायों के लिए समान विवाह आयु, तलाक, भरण-पोषण, गोद लेने, उत्तराधिकार और विरासत की मांग करने वाली जनहित याचिकाओं को एक साथ टैग किया था. याचिकाओं में तर्क दिया गया कि व्यक्तिगत कानूनों के भीतर मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाएं, जो अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती हैं, और अनुच्छेद 21, जो गरिमा के अधिकार का वादा करती है, और अनुच्छेद 15, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करती है. याचिकाओं में कहा गया है कि इस तरह की प्रथाएं महिलाओं को पुरुषों की तुलना में हीन स्थिति में रखती हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on Sep 06, 2022 09:23 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).