HC on Husband Wife and DNA Test: बच्चे की पितृत्व पर सवाल उठाना और पत्नी पर DNA टेस्ट का दबाव बनाना मानसिक क्रूरता: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शादी के बाद पैदा हुए बच्चे के पितृत्व पर संदेह करना और पत्नी को डीएनए टेस्ट कराने के लिए मजबूर करना 'मानसिक क्रूरता' के दायरे में आता है. कोर्ट ने इसी आधार पर दंपत्ति के तलाक की मंजूरी को बरकरार रखा है.
HC on Husband Wife and DNA Test: मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) ने पारिवारिक विवादों और वैवाहिक अधिकारों को लेकर एक दूरगामी फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह करता है, शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे की पितृत्व (Paternity) पर सवाल उठाता है, या पत्नी पर डीएनए (DNA) टेस्ट कराने का दबाव बनाता है, तो उसका यह व्यवहार कानूनन 'मानसिक क्रूरता' (Mental Cruelty) माना जाएगा. कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ पीड़ित पत्नी के पक्ष में निचली अदालत द्वारा दिए गए तलाक (Dissolution of Marriage) के आदेश को सही ठहराया. यह भी पढ़ें: Live-In Rape and Courts Verdict: लिव-इन पार्टनर से शादी करने से इनकार करना 'रेप' नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक दंपत्ति के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है. पति ने अपनी याचिका में पत्नी पर कई आरोप लगाए थे और बच्चे के अपने होने पर संदेह व्यक्त किया था. उसने कोर्ट के समक्ष यह मांग भी रखी थी कि सच्चाई का पता लगाने के लिए महिला और बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जाना चाहिए.
निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) ने पति के इस व्यवहार को क्रूरता मानते हुए महिला की तलाक की अर्जी को मंजूर कर लिया था. इसके बाद पति ने इस फैसले को चुनौती देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था.
पत्नी पर DNA टेस्ट का दबाव बनाना मानसिक क्रूरता
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पति की दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया. उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, "हम यह मानते हैं कि प्रतिवादी (पति) ने लगातार क्रूरतापूर्ण कृत्य किया है, विशेष रूप से बच्चे के पितृत्व को चुनौती देकर और पत्नी को डीएनए जांच से गुजरने के लिए कहकर."
अदालत ने आगे रेखांकित किया कि बिना किसी ठोस या अकाट्य साक्ष्य के एक विवाहित महिला पर इस तरह के आरोप लगाना उसके आत्मसम्मान और मानसिक शांति को गहरी ठेस पहुंचाता है. यह समाज में उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने जैसा है, जो हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए पर्याप्त है.
कानूनी और सामाजिक संदर्भ
भारतीय कानून के तहत, साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 112 के अनुसार, शादी के दौरान पैदा हुए किसी भी बच्चे को कानूनी रूप से वैध (Legitimate) माना जाता है, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध की कोई संभावना ही नहीं थी.
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहाँ पति अक्सर कानूनी दांव-पेंच या भरण-पोषण (Maintenance) से बचने के लिए बिना किसी मजबूत आधार के डीएनए टेस्ट की मांग करते हैं. अदालत ने साफ कर दिया है कि वैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा को ठेस पहुँचाने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता.