मद्रास हाई कोर्ट ने तीन मासूम बच्चियों से दुष्कर्म के दोषी की फांसी की सजा रखी बरकरार, कहा- 'ऐसे दरिंदे को छोड़ना गलत दया होगी'
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: File Image)

मद्रास हाई कोर्ट (Madras High Court) ने तीन मासूम बच्चियों के साथ डिजिटल और शारीरिक यौन उत्पीड़न (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के दोषी की मौत की सजा को हरी झंडी दे दी है. हाई कोर्ट की मदुरै पीठ के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने तिरुनेलवेली की विशेष पोक्सो (POCSO) अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा. अदालत ने बेहद सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि दोषी द्वारा किया गया कृत्य इतना घृणास्पद और मानवीय चेतना से परे था कि ऐसे व्यक्ति की जान बख्शना 'गलत जगह दिखाई गई दया' (Misplaced Mercy) होगी, जो न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है. यह भी पढ़ें: Live-In Rape and Courts Verdict: लिव-इन पार्टनर से शादी करने से इनकार करना 'रेप' नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

'अगर राक्षस को जेल का आराम मिला, तो समाज में गलत संदेश जाएगा'

हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा, 'एक ऐसा अपराध जो इतना वीभत्स है और जिसमें मानवीय संवेदना की एक भी बूंद नहीं बची, वह न्यायपालिका से ऐसे जवाब की मांग करता है जो समाज के सामूहिक आक्रोश को प्रतिबिंबित करे. इतने ठंडे दिमाग से और लंबे समय तक क्रूरता करने वाले अपराधी की जान बख्शना मासूमों की बर्बादी पर कानून को मूकदर्शक बनाने जैसा होगा. इससे समाज में यह विनाशकारी संदेश जाएगा कि एक बच्चे की आत्मा बहुत सस्ती है और एक राक्षस अपने पीड़ितों की जीवन भर की शांति का सौदा जेल की कोठरी के आराम से कर सकता है.'

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare Cases) की श्रेणी में आता है, जहां फांसी के अलावा किसी अन्य वैकल्पिक सजा का विकल्प पूरी तरह से बंद हो जाता है. खंडपीठ ने कहा कि जब कोई अपनी अंधकारमय प्रवृत्तियों को संतुष्ट करने के लिए बच्चों को शिकार बनाता है, तो कानून की रीढ़ फौलाद जैसी होनी चाहिए.

मद्रास हाई कोर्ट ने तीन मासूम बच्चियों से दुष्कर्म के दोषी की फांसी की सजा रखी बरकरार

डरा-धमकार एक साल तक बच्चियों को बनाया शिकार

अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, पीड़ित तीनों बच्चियों (उम्र 6, 7 और 8 वर्ष) के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, जो काम के सिलसिले में बच्चों को रिहायशी इलाके में ही छोड़ जाते थे. सप्ताहांत (वीकेंड) पर जब बच्चियां घर के बाहर खेल रही होती थीं, तो पड़ोस में रहने वाला दोषी आनंद शेखर उन्हें बहला-फुलाकर घर के अंदर ले जाता था. वह दरवाजा अंदर से बंद करके उनके साथ गंभीर यौन उत्पीड़न करता था.

आरोपी ने बच्चियों को जान से मारने की धमकी दी थी और किसी को कुछ न बताने के लिए आतंकित कर रखा था. यह दरिंदगी करीब एक साल तक चलती रही. 26 फरवरी 2023 को जब एक बच्ची ने आरोपी को देखकर डर के मारे घर की तरफ दौड़ लगाई, तब उसकी सहेली के पूछने पर उसने पूरी आपबीती बताई. बच्चियों की बातचीत को एक मां ने सुन लिया, जिसके बाद अन्य माता-पिता को सूचित कर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई.

कोर्ट ने खारिज की बचाव पक्ष की दलीलें

बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी थी कि मेडिकल जांच में बच्चियों को कोई आंतरिक चोट नहीं आई है, इसलिए यह गंभीर श्रेणी का अपराध नहीं है. इसके अलावा शिकायत दर्ज कराने में भी देरी हुई है. अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पोक्सो कानून के तहत पीड़ित बच्चों के बयान में थोड़ी-बहुत भिन्नता होना स्वाभाविक है क्योंकि 6 से 8 साल के बच्चे वयस्कों की तरह खुलकर अपनी बात नहीं समझा सकते, लेकिन उनके बयानों का मूल आधार बिल्कुल सुसंगत है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सामाजिक लोक-लाज और असर के डर से परिवारों को शिकायत करने में समय लगता है, इसलिए देरी को आधार बनाकर आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता. अदालत ने साफ किया कि बच्चों के गुप्तांगों को छूना और अश्लील कृत्य करना सीधे तौर पर 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' के दायरे में आता है, और चूंकि बच्चियां 12 साल से कम उम्र की थीं, इसलिए पोक्सो की धारा 5(l) और 5(m) के तहत अपराध पूरी तरह साबित होता है.