बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) और शादी के वादे को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि दो आपसी सहमति वाले वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में शारीरिक संबंधों को कानूनी रूप से सहमति पर आधारित माना जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि रिश्ते के बाद यदि कोई पुरुष शादी करने से इनकार कर देता है, तो महज इसी आधार पर उस पर बलात्कार (Rape) का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. यह भी पढ़ें: Karnataka High Court: पति से ज्यादा कमाने वाली आत्मनिर्भर पत्नी सिर्फ महिला होने के नाते नहीं मांग सकती गुजारा भत्ता; हाईकोर्ट ने बदला फैसला
केवल शादी की इच्छा जताना ही पूरी वजह नहीं
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल शादी करने की इच्छा व्यक्त करने का यह मतलब स्वचालित रूप से नहीं निकाला जा सकता कि शारीरिक संबंध के लिए महिला की सहमति सिर्फ और सिर्फ उसी वादे के आधार पर प्राप्त की गई थी.
अदालत के अनुसार, जब दो वयस्क लंबे समय तक एक साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं, तो वे अपने फैसलों के परिणामों को अच्छी तरह समझते हैं.
लिव-इन पार्टनर से शादी करने से इनकार करना 'रेप' नहीं
Refusal to marry long-term live-in partner won’t amount to rape: Chhattisgarh High Court
The Chhattisgarh High Court has ruled that in a long-term live-in relationship between two consenting adults, the law may presume the physical relationship was consensual, and a later… pic.twitter.com/25xpYnvj5M
— News18 (@CNNnews18) June 30, 2026
निचली अदालत के फैसले को रखा बरकरार
यह फैसला हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए सुनाया, जिसे निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों से बरी कर दिया था.
हाई कोर्ट ने मामले के तमाम सबूतों और गवाहों की समीक्षा करने के बाद पाया कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक रहे संबंध पूरी तरह से स्वैच्छिक और आपसी सहमति से थे. इसलिए, निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी करने का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत था.
निर्णय का कानूनी और सामाजिक महत्व
यह फैसला देश की विभिन्न अदालतों द्वारा पूर्व में दिए गए उन निर्णयों की कड़ियों को और मजबूत करता है, जिनमें 'शादी के झूठे वादे' और 'सहमति से बने लंबे संबंधों' के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है.
अदालत ने रेखांकित किया कि कानून उन मामलों में हस्तक्षेप करता है जहां संबंध बनाने की शुरुआत ही केवल और केवल धोखे या झूठे वादे से की गई हो. लेकिन जहां दो लोग लंबे समय तक स्वेच्छा से साथ रहते हैं, वहां बाद में आया अलगाव या शादी से इनकार आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता.












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