जर्मनी ही नहीं यूरोप पर भी होगा सैक्सनी अनहाल्ट के चुनावों का असर
जर्मन राज्य सैक्सनी अनहाल्ट के चुनावों में एएफडी को बड़ी बढ़त मिली है.
जर्मन राज्य सैक्सनी अनहाल्ट के चुनावों में एएफडी को बड़ी बढ़त मिली है. इसका असर सिर्फ जर्मनी ही नहीं पूरे यूरोप की राजनीति पर भी हो सकता है. आप्रवासन जैसे मुद्दों पर आंतरिक राजनीति में खींचतान और बढ़ सकती है.जर्मनी के सैक्सनी अनहाल्ट प्रांत में मतदाताओं ने फैसला कर लिया है. धुर दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी को रिकॉर्ड वोट मिले हैं और पार्टी प्रदेश में सरकार बनाने के काफी करीब पहुंच गई है. पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार 44.5 फीसदी मतों के साथ उसका जनाधार दोगुने से ज्यादा हो गया है. चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की सत्ताधारी सीडीयू पार्टी को मतदाताओं ने सजा दी है और उसके वोट इस बार आधे से कम ही रह गए हैं.
सैक्सनी अनहाल्ट के चुनावों को जर्मनी के लिए महत्वपूर्ण कहा जा रहा था क्योंकि एकीकरण के बाद पहली बार एक ऐसी पार्टी लोकतांत्रिक चुनावों के जरिये सत्ता के करीब पहुंची है जिसे लोकतंत्र विरोधी और धुर-दक्षिणपंथी पार्टी करार दिया गया है. फिर भी मतदाताओं में उसकी लोकप्रियता बढ़ी है. तो इस चुनाव के जर्मनी, जर्मनी की मौजूदा गठबंधन सरकार और यूरोप के लिए क्या मायने हैं?
राजनैतिक दोराहे पर है जर्मनी
चुनावी नतीजों ने जर्मनी को ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है जो जर्मनी के 80 सालों के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार गंभीर संकट का कारण बन सकता है. और संकट ये है कि जर्मनी की सरकार न तो तो एएफडी के साथ चल सकती है, न उसके बिना. सैक्सनी अनहाल्ट में देश के सिर्फ 3 फीसदी मतदाता हैं. ये कोई बड़ी संख्या नहीं है, लेकिन यहां मतदाताओं की प्राथमिकता दूसरे प्रांतों के लिए मिसाल बन सकती है. दो हफ्ते में मैक्लेनबुर्ग वेस्ट पोमेरेनिया और बर्लिन में चुनाव होने वाले हैं. वहां के चुनावों पर इन नतीजों का असर हो सकता है.
जर्मनी: प्रवासी पृष्ठभूमि वाले मतदाताओं को कैसे लुभा रही हैं पार्टियां?
करीब 13 साल पहले यूरो विरोधी गुट के रूप में बनी पार्टी इस बीच काफी बड़ी हो गई है और रैडिकल भी. उसकी लोकप्रियता सरकार के सुधारवादी कदमों के विरोध के साथ साथ तथाकथित बेलगाम आप्रवासन के विरोध पर टिकी है. इसका फायदा उसे इसलिए भी मिला है कि पिछले वर्षों में जर्मनी में बढ़े आप्रवासन के अलावा यूक्रेन पर रूसी हमले और ईरान युद्ध के कारण लोगों पर आए महंगाई के बोझ पर वह ऐसी पार्टी है, जो दूसरी पार्टियों से अलग रवैया अपनाती है. कुछ लोगों को एएफडी के रूप में अपनी हताशा को आवाज देने वाला मिला है.
सरकार बनाने के लिए साथी की जरूरत
चुनावों में एएफडी को अकेले बहुमत नहीं मिला. लेफ्ट से टूटकर बनी बीएसडब्ल्यू को करीब पांच प्रतिशत मत मिले हैं. चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए बयानों को देखें तो एएफडी को उसका समर्थन संभव लगता है. ऐसा होता है तो सारी स्थापित पार्टियां विरोध में होंगी और धुर विचारधारा की पार्टियां सरकार में होंगी. अगर ऐसी सरकार बनी तो जर्मनी में पहली बार एक ऐसे गठबंधन की सरकार होगी जिसे प्रांतीय सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है और न ही उनके पास अनुभवी प्रशासक हैं. लेकिन पार्टी ने अपने नेताओं को बजट कानून, मंत्रालयों के रोजमर्रा के कामकाज और राजनैतिक पत्र लिखने की कला में ट्रेनिंग देना पहले ही शुरू कर दिया था.
स्थापित पार्टियों के लिए भी एएफडी की चुनौती आसान नहीं है. सैक्सनी अनहाल्ट के मौजूदा मुख्यमंत्री स्वेन शुल्त्से ने अपनी पार्टी की हार स्वीकार की है लेकिन कहा कि यही लोकतंत्र है. पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार करीब 16 प्रतिशत ज्यादा वोटरों ने मतदान किया है. रिकॉर्ड 76.5 फीसदी. एएफडी करीब दो लाख निराश वोटरों को फिर से पोलिंग बूथ पर लाने में कामयाब रही है. एएफडी की जीत में उनका अहम योगदान है. सीडीयू की संसदीय पार्टी के नेता टॉर्स्टेन फ्राय ने चुनावी नतीजों को जर्मनी के इतिहास में एक मोड़ कहा है. उन्होंने कहा, "पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि प्रांतीय संविधान सुरक्षा एजेंसी द्वारा उग्र दक्षिणपंथी ठहराई गई पार्टी ने सबसे ज्यादा मत हासिल किया हो."
मजबूत हो सकती हैं दूसरी उग्रपंथी पार्टियां
एएफडी ने चुनाव से पहले अपना जो चुनावी प्रोग्राम पेश किया, वह हर उस चीज को बदलने वाला प्रोग्राम है जिसपर अब तक जर्मनी में व्यापक आम सहमति रही है. एएफडी की इस जीत से न सिर्फ जर्मनी में बल्कि यूरोप के दूसरे देशों में भी उग्रपंथी विचारधारा की पार्टियों के हौसले मजबूत होंगे. आने वाले चुनावों में उनकी ताकत बढ़ेगी, समाज पर उनका प्रभाव बढ़ेगा. कम से कम माइग्रेशन पर इसका असर फौरन होगा. धुर दक्षिणपंथी पार्टियों की बढ़त को रोकने के लिए सभी पार्टियां यूरोप में बाहर से आने वाले लोगों पर रोक लगाती दिखेंगी. यूरोपीय देशों में सैक्सनी अनहाल्ट में एएफडी की जीत का असर दिखना आने वाले महीनों में शुरू हो जाएगा.
जर्मनी में इसका असर सरकार की आर्थिक सुधार की योजनाओं पर दिखेगा. टैक्स और सामाजिक सुरक्षा में कटौतियों के जरिये देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की योजना पर अमल आसान नहीं रहेगा. एएफडी का विरोध दूसरी विपक्षी पार्टियों को भी सरकार पर दबाव डालने के लिए मजबूर करेगा. आने वाले महीने जर्मनी के साथ साथ यूरोपीय देशों के लिए कठिन फैसले के महीने होंगे.