बिहार में नीतीश राज खत्म, बीजेपी के सम्राट चौधरी होंगे नये मुख्यमंत्री

लंबे इंतजार के बाद बिहार में बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बनाने में कामयाबी मिली.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

लंबे इंतजार के बाद बिहार में बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बनाने में कामयाबी मिली. नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बतौर सीएम बीजेपी के सम्राट चौधरी के नाम की घोषणा हो गई. बिहार में दो दशक बाद अंतत: नीतीश युग खत्म हुआ.पर्यवेक्षक बनाए गए केंद्रीय कृषि व ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की मौजूदगी में बीजेपी विधानमंडल दल ने सम्राट चौधरी को अपना नया नेता चुना. बुधवार को लोकभवन में सम्राट के शपथ ग्रहण करते ही बिहार को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा. 2025 में विधानसभा के लिए मुंगेर जिले के तारापुर से निर्वाचित बीजेपी नेता सम्राट चौधरी नीतीश मंत्रिमंडल में उप-मुख्यमंत्री और गृहमंत्री रहे हैं. उनके पिता भी कद्दावर राजनेता थे. बिहार में सत्ता परिवर्तन की पटकथा उस दिन ही लिख दी गई थी जब नीतीश राज्यसभा के लिए चुन लिए गए. सीएम रहते राज्यसभा का सदस्य बनने वाले वे पहले नेता होंगे.

करीब 20 साल तक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. इस्तीफा सौंपने के पहले नीतीश ने सबसे पहले डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और फिर अपने कैबिनेट की आखिरी बैठक की. इस बैठक में उन्होंने कहा, ‘2005 में मैं सरकार में आया, जहां तक मुझसे जो हो सका वह मैंने किया. नई सरकार को मेरा मार्गदर्शन मिलता रहेगा.' उन्होंने बिहार के विकास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी धन्यवाद दिया. इस बैठक में माहौल भावुक रहा. दो-तीन मंत्री रोते हुए भी देखे गए. अपने मन-मिजाज से राजनीति करने वाले नीतीश की धमक राष्ट्रीय राजनीति में भी बनी रही. पक्ष-विपक्ष, दोनों को ही वे स्वीकार्य रहे. उन्होंने राज्य में कानून का राज स्थापित किया तथा गवर्नेंस को नई दशा-दिशा दी. इसलिए उन्हें सुशासन बाबू की संज्ञा दी गई.

राज्यपाल सैयद अता हसनैन को त्यागपत्र सौंपने के बाद नीतीश ने एक्स पर एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बिहार में 24 नवंबर, 2005 को पहली बार एनडीए सरकार की कमान संभालने के बाद से आज तक अपनी सरकार द्वारा किए गए कार्यों की चर्चा की तथा आगे भी अच्छा काम होने व बिहार के बहुत आगे बढ़ने की उम्मीद जाहिर की है. नीतीश कुमार राज्य के छठे ऐसे नेता बन गए हैं, जो बिहार विधानमंडल (विधानसभा-विधान परिषद) तथा संसद (लोकसभा-राज्यसभा) के दोनों सदनों के सदस्य होंगे.

पांच महीने बाद ही फिर नई सरकार

2025 का बिहार विधानसभा चुनाव '2025 से 30, फिर से नीतीश' के नारे के साथ लड़ा गया था. जनता ने इस नारे पर विश्वास किया और दो-तिहाई से अधिक बहुमत के साथ प्रदेश में एनडीए की सरकार बनी. लेकिन, महज पांच महीने ही बीते थे कि एक बार फिर अब नई सरकार बन रही. 15 अप्रैल, बुधवार को सम्राट चौधरी सीएम पद की शपथ लेंगे. उनके साथ जेडीयू के विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र यादव उप-मुख्यमंत्री बनेंगे.

नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार ने उप-मुख्यमंत्री बनने से साफ इन्कार कर दिया है. ऐसा समझा जा रहा कि नई सरकार में बीजेपी और जेडीयू के 15-15 तथा लोक जनशक्ति पार्टी (आर) के दो, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के एक-एक मंत्री होंगे. संभावना है कि विधानसभा अध्यक्ष और गृह मंत्री का पद भी बीजेपी अपने पास रखेगी. कई नए चेहरे भी सामने आएंगे.

राजनीतिक समीक्षक अरुण कुमार चौधरी कहते हैं, "पिछले पंद्रह साल में चार बार विधानसभा चुनाव और अब 10वीं बार मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण. नौ बार तो नीतीश ने ही शपथ ली. यह तो उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का ही परिणाम रहा और उन्होंने सत्ता का बखूबी इस्तेमाल भी किया." इससे आमजन का ही नुकसान हुआ. चुनाव जीतने के लिए उन्होंने भी फ्री-बीज का सहारा लिया.

यह ठीक है कि महिला सशक्तिकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार तथा कानून का राज उन्होंने कायम किया, लेकिन आज भी कई इंडेक्स पर बिहार नीचे है. इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश ने थ्री-सी यानी क्राइम, कम्युनलिज्म और करप्शन से कभी समझौता नहीं किया. वैसे नौकरी व निकायों के चुनाव में महिलाओं को आरक्षण, पोशाक व साइकिल जैसी योजनाओं तथा सत्ता हेतु पाला बदलने के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे.

पहली बार सत्ता पर बीजेपी का सीधा नियंत्रण

बिहार के इतिहास में पहली बार सत्ता की कमान बीजेपी को मिली है. अब उसका सीधा नियंत्रण होगा. संख्या बल में ज्यादा होने पर भी बीजेपी अभी तक छोटे साझेदार की भूमिका में थी. इसके उलट अब जेडीयू सहयोगी की भूमिका में होगी. इस बदलाव का सीधा असर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति पर होगा. चौधरी कहते हैं, "नीतीश युग पर विराम लगने के साथ ही कालांतर में बिहार की राजनीति सीधे तौर पर बीजेपी बनाम आरजेडी होने की संभावना प्रबल है. नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की बात छोड़ दें तो जेडीयू में सेकेंड लाइन कमजोर है." संजय झा, ललन सिंह जैसे नेता आज पार्टी में पहली कतार में भले ही दिख रहे हों, किंतु यह स्थिति कितने दिनों तक रहेगी. यह कहना मुश्किल है. इन नेताओं की स्वीकार्यता भी नीतीश के कारण ही थी. आज भी पार्टी में इनका विरोध हो रहा है.

जेडीयू भी जाति की राजनीति करती रही है, भले ही उसके पॉकेट कई तरह के हों. बीजेपी की भी नजर तो इनके वोट बैंक पर रहेगी. पत्रकार अमिता तिवारी कहती हैं, "भविष्य में नए पॉलिटिकल अलायंस और हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय की लड़ाई जोर पकड़ता दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आरजेडी दलित व ओबीसी वोट को साधने की कोशिश करेगी तो बीजेपी ईबीसी (अति पिछड़ा) और लव-कुश को. लव-कुश को तुष्ट करने के ख्याल से ही बीजेपी ने तो सम्राट चौधरी का चयन किया है."

अगर बिहार में जातिगत समीकरण बदला तो राष्ट्रीय राजनीति भी इससे अछूती नहीं रह जाएगी. नई परिस्थिति की वजह से जेडीयू ऊपर से भले ही शांत दिख रही है, किंतु पार्टी में फैले अविश्वास व टूट की आशंका से बीजेपी की राह शायद आसान नहीं होगी.

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