ईरान युद्ध का भारत पर असर, लाखों की संख्या में फंसे भारतीय

मध्य पूर्व में पिछले दो हफ्ते से जारी युद्ध का असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

मध्य पूर्व में पिछले दो हफ्ते से जारी युद्ध का असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है. भारत के लाखों लोग मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों में रहते हैं. उड़ानें बंद होने के कारण लोग वहां से लौट नहीं पा रहे हैं और इधर युद्ध की भयईरान के खिलाफ इस्राएल और अमेरिका के युद्ध के चलते भारत के लाखों लोग खाड़ी के देशों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या कामगारों, छात्रों और पर्यटकों की है. इधर भारत में बैठे उनके परिजन दिन-रात हालात जानने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी सुरक्षित वापसी की दुआ कर रहे हैं. हालांकि भारत सरकार की तरफ से यहां फंसे हजारों यात्रियों की अब तक सकुशल वापसी कराई गई है लेकिन बड़ी संख्या में अभी भी लोग वापस आने के लिए परेशान हैं.

भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक 28 फरवरी को युद्ध छिड़ने के बाद 1 से 7 मार्च के बीच खाड़ी क्षेत्र से 52 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है. इनमें से 32 हजार लोगों ने भारतीय विमानों से यात्रा की जबकि बाकी लोग विदेशी एअरलाइंस से वापस आए.

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विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस कान्फ्रेंस में बताया, "भारत सरकार पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रमों पर लगातार नजर रख रही है, खासकर उन पर जो ट्रांजिट के दौरान या फिर अल्पकालिक यात्राओं के दौरान वहां फंस गए हैं. क्षेत्र में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय अधिकारियों के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ अपने स्थान पर स्थित भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास द्वारा जारी की जा रही एडवाइजरी का पालन करें.”

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राएल की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' के बाद इस क्षेत्र में हालात तेजी से बदले हैं. कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे अस्थायी रूप से बंद हैं और उड़ानें रद्द कर दी गई हैं. इसका सीधा असर इन देशों में रह रहे लोगों पर पड़ रहा है जो वहां कामकाज या फिर पढ़ाई और पर्यटन के लिए जाते हैं. खाड़ी के अलग-अलग देशों में भारत के करीब एक करोड़ लोग रहते हैं.

90 लाख से ज्यादा भारतीय हैं खाड़ी के देशों में

खाड़ी देशों यानी फारस की खाड़ी में बसे छह देशों में भारतीयों की एक बड़ी आबादी रोजगार के लिए जाती है. विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. रोजगार की उपलब्धता और बेहतर वेतन वहां जाने के लिए लोगों को आकर्षित करता है. अकेले उत्तर प्रदेश से करीब पचीस लाख लोग इन देशों में हैं, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के. हालांकि अन्य इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग इन देशों में रह रहे हैं. बड़ी संख्या में घूमने के लिए भी लोग इन देशों का रुख करते हैं. लेकिन अब हवाई सेवाएं ठप होने से बहुत से लोगों को वहीं रुकना पड़ा है और यहां उनके घरों में बेचैनी का माहौल है.

बनारस के रहने वाले दुर्गेश कुमार दुबई में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "रोजगार की तलाश और ज्यादा पैसे कमाने के लिए अभी दो महीने पहले ही यहां आए थे लेकिन यहां तो युद्ध छिड़ गया है. हालांकि आम लोगों को बहुत खतरा तो नहीं है, लेकिन फिर भी हम लोग डरे हुए हैं. काम करने के बाद चुपचाप अपने-अपने कमरों में रहने चले जाते हैं. हर समय इस बात का खतरा बना रहता है कि कहीं कोई मिसाइल आकर न गिर जाए.”

हालांकि कई लोगों का ये भी कहना है कि रिहायशी इलाकों में किसी तरह का कोई डर नहीं है. नीरज निषाद गोरखपुर के रहने वाले हैं. दुबई के अलकूज में रहते हैं और पेंटिंग के ठेकेदार हैं. उनका कहना है कि शुरुआत में थोड़ा डर का माहौल था, लेकिन अब स्थिति सामान्य है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में नीरज निषाद कहते हैं, "यहां तो सब कुछ ठीक है. हां, बाहरी इलाकों में जरूर थोड़ा डर का माहौल है. पर हम लोग जहां हैं, वहां कोई डर नहीं है. हालांकि यहां से कुछ दूरी पर एक हफ्ते पहले एक मिसाइल गिरी थी लेकिन उसके बाद से कोई ऐसी घटना नहीं हुई. रिहायशी इलाकों में मिसाइल या बम नहीं गर रहे हैं.”

सुरक्षित लेकिन खौफ बरकरार

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के भी सैकड़ों लोग सऊदी अरब और यूएई सहित कई खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. युद्ध के बाद बने तनाव से उनके परिवार की चिंताएं बढ़ गई हैं. मुरादाबाद के जमील कहते हैं कि उनका बेटा सऊदी अरब में नाई का काम करता है. उनके मुताबिक, "बेटा जहां रहता है उस बिल्डिंग को युद्ध शुरू होने के बाद खाली करा लिया गया था. बेटे और उसके साथी सुरक्षित जगह पर तो हैं, फिर भी हम लोगों को हर समय उनकी फ्रिक बनी रहती है. कई बार बात भी नहीं हो पाती, इसलिए चिंता बढ़ जाती है.”

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यूपी से बड़ी संख्या में लोग पढ़ाई के लिए ईरान का रुख करते हैं लेकिन लड़ाई के बाद से वहां भी अफरा-तफरी मची हुई है. संभल के मौलाना गुफरान नकवी पिछले दो साल से ईरान में पढ़ाई कर रहे हैं. उनके भाई मोहम्मद फहमान नकवी बताते हैं कि जहां वे रह रहे है, वहां स्थिति सामान्य है लेकिन खौफ बना रहता है.

बाराबंकी जिले के दर्जनों लोग ईरान के कुम शहर और अन्य इलाकों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो धार्मिक शिक्षा या फिर जियारत के लिए वहां गए थे. कई परिवारों का संपर्क वहां रह रहे अपने परिजनों से टूट चुका है.

इस्राएल जाने पर रोक!

इस बीच, उत्तर प्रदेश के 300 कामगारों के इस्राएल जाने पर 21 मार्च तक रोक लगा दी गई है. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएसडीसी) और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त रूप से यह फैसला लिया है. उत्तर प्रदेश श्रम एवं सेवायोजन विभाग और एनएसडीसी के साथ इस्राइल की टीम ने पिछले महीने कानपुर में इन कामगारों का चयन किया था. इस्राइल में शटरिंग कारपेंटर, आयरन वेल्डिंग, प्लास्टरिंग और सिरेमिक टाइलिंग के काम के लिए इन श्रमिकों का चयन हुआ है.

लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत उन लोगों को हो रही है जो खाड़ी के देशों से आना चाहते हैं. कई लोग पहले से ही योजना बनाए थे आने की लेकिन हवाई मार्ग बंद होने और फ्लाइट रद्द होने के कारण नहीं आ पा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, युद्ध की स्थितियों के बावजूद भारत से खाड़ी देशों की ओर जाने वालों की कमी नहीं दिख रही है. गौरव दुबे गोरखपुर में एक ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं. उनके पास हर साल हजारों लोग थाईलैंड, इंडोनेशिया और खाड़ी देशों में जाने के लिए हवाई टिकट लेते हैं. उनका कहना है कि ट्रैवल एजेंसियों का व्यापार भी ठप सा हो गया है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में गौरव दुबे कहते हैं कि पिछले 12 दिन से गिनती के टिकट बिके हैं. उनके मुताबिक, "यहां से ज्यादातर लोग रोजी-रोजगार के लिए जाते हैं. यदि फ्लाइट सामान्य रूप से जाएं तो जाने वालों की कमी नहीं और यहां उनके परिजन भी परेशान नहीं हैं. लेकिन सामान्य फ्लाइट को स्पेशल फ्लाइट का नाम दे दिया गया है और किराया ज्यादा वसूला जा रहा है. बनारस से दुबई और शरजाह के लिए 17-18 हजार रुपये में सामान्य तौर पर टिकट मिल जाता है लेकिन अब यही टिकट 25-30 तीस हजार रुपये में मिल रहा है.”

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