Shab-e-Barat 2020: कब है शब-ए-बारात? इस रात अल्लाह फरिश्तों को क्या जिम्मेदारी देता है? क्या लॉक-डाउन में ज्यादा होगी इबादत

इस रात मुस्लिम दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं. शब-ए-बारात की सारी रात इबादत और तिलावत का दौर चलता है. इस त्यौहार का अरबी नाम ‘लैलतुन निसफे मीन शाबान’ या ‘लैलतुल बराह’ है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: IANS)

Shab-e-Barat 2020: गौरतलब है कि शआबान महीने का चांद 25 मार्च 2020 को नहीं देखा गया. 30 की रवायत के मुताबिक इमारत सरिया पटना ने 27 मार्च को शआबान महीने की पहली तारीख की घोषणा कर दी. हिजरी कैलेंडर के अनुसार शाबान (8वां माह) महीने के 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद, यह त्यौहार शुरू होता है, जो पूरी रात चलता है. इस्लाम धर्म को मानने वाले इस पूरी रात अल्लाह की इबादत करते हैं. इस्लाम में यह रात बेहद फजीलत की रात मानी जाती है.

इस रात मुस्लिम दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं. शब-ए-बारात की सारी रात इबादत और तिलावत का दौर चलता है. इस त्यौहार का अरबी नाम ‘लैलतुन निसफे मीन शाबान’ या ‘लैलतुल बराह’ है.

भारत में कब है ‘शब-ए-बारात’

इस साल भारत में ‘शब-ए-बरात’ का पर्व 9 अप्रैल 2020 (बृहस्पतिवार) को मनाया जाएगा. इस संदर्भ में भारत के अनेक मुस्लिम संगठनों ने इसकी घोषणा कर दी है. ध्यान रहे कि 14 अप्रैल तक पूरे भारत में लॉक डाउन है. इसलिए माना जा रहा है कि हर वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा इबादत करने का मौका मिलेगा.

कब शुरु हुआ शब-ए-बारात

मान्यता है कि अल्लाह के नबी पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्म से लेकर पालन-पोषण तक मक्का में हुआ. मुहम्मद साहब बहुत नेक दिल के थे, लोग उन्हें बहुत मानते थे. कहा जाता है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु ने कभी किसी को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया था, बल्कि अपने नेक कारणो से लोगों ने इस धर्म के बारे में सोचने को विवश कर दिया. गुजरते समय के साथ वह काफी लोकप्रिय हो गये थे. लेकिन उनकी इस लोकप्रियता से मक्का के तत्कालीन राजनीतिक शासकों को खतरा महसूस होने लगा. राजनीतिज्ञों ने 622 में उन्हें मक्का छोड़ने पर मजबूर कर दिया तो वे मदीना चले गये.

पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अभियान के दौरान, उन्होंने रक्तपात से परहेज किया और कई लोगों को माफी दे दी. 630वीं शताब्दी में मक्का लौटने के उपलक्ष्य में मुसलमान समुदाय़ शब-ए- बारात मनाई जाती है. आम मुसलमानों का मानना है कि दुनिया वालों ने पहली बार 630वीं शताब्दी में यह त्यौहार मनाया.

अल्लाह अपने फरिश्तों को साल भर की जिम्मेदारी देता है

इस्लाम में इस रात की बड़ी फजीलत बतायी गयी है. इसी रात अल्लाह अपने फरिश्तों को पूरे साल की जिम्मेदारी सौंपता है. यानी किसकी मौत होगी और किसकी पैदाइश, किसकी शादी होगी और किसे कितना रोजगार मिलेगा इत्यादि. कहने का आशय यह कि अल्लाह यह सारा लेखा-जोखा अपने फरिश्तों को सौंप देता है. इसके बाद अल्लाह अपने आसमान पर आ जाते हैं. इस रात इबादत का खास एहतिमाम किया जाता है. गरीबों को इमदाद बांटी जाती है.

घरों में औरतें एहतिमाम के साथ कुरान शरीफ की तिलावत करती हैं और नमाज अदा की जाती है. इसके अलावा इस दुनिया से विदा हो चुके पूर्वजों की कब्रों पर जाकर उनके पक्ष में दुआ की जाती है.

इस्लाम की चार बड़ी रातों में एक है शब-ए-कद्र की रात

इस्लाम में इबादत के अनुसार पहले नंबर पर आशूरा की रात है, दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बारात व चौथी शब-ए-कद्र होती है. इन रातों की इबादत काफी बेहतर माना जाता है.

कैसे करें इबादत ‘शब-ए-बारात’ की

‘शब-ए-बारात’ की नमाज़ में मुख्यतः नफल व तहजूद है. ‘शब-ए-बारात’ की दुआ में अपने और परिवार के लोगों लिए माफी मांगनी चाहिए. ‘शब-ए-बारात’ की रात इबादत की रात होती है. मान्यता है कि यह पूरी रात इबादत में गुजारना चाहिए. रात के पहले हिस्से में कब्रिस्तान जरूर जाना चाहिए. नफल व तहजूद के नमाज़ के इलावा जो अभी समय बचे उसे तिलावते कुरआन को देना चाहिए.

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