India-China Border Tension: पीएलए के खिलाफ 1967 की कार्रवाई के लिए सेना ने चो ला दिवस मनाया

भारतीय सेना ने गुरुवार को चो ला दिवस मनाया. यह दिवस 1967 में चो ला पास में झड़प के दौरान चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों को नाकों चने चबवाने वाले भारतीय जवानों की बहादुरी को याद करने के लिए मनाया गया. यह आखिरी बार था, जब दोनों सेनाओं के सैनिकों के बीच बड़े पैमाने पर एक हिंसक झड़प हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप 200 भारतीय और 300 पीएलए सैनिकों की मौत हो गई.

प्रतिकात्मक तस्वीर (Photo Credits: PTI)

नई दिल्ली, 1 अक्टूबर. भारतीय सेना ने गुरुवार को चो ला दिवस मनाया. यह दिवस 1967 में चो ला पास में झड़प के दौरान चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों को नाकों चने चबवाने वाले भारतीय जवानों की बहादुरी को याद करने के लिए मनाया गया. यह आखिरी बार था, जब दोनों सेनाओं के सैनिकों के बीच बड़े पैमाने पर एक हिंसक झड़प हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप 200 भारतीय और 300 पीएलए सैनिकों की मौत हो गई.

उस घटना के 50 से अधिक वर्षों के बाद 15 जून, 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच हिंसक झड़प देखने को मिली, जिसके परिणामस्वरूप 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। इस झड़प में चीनी सैनिक भी हताहत हुए, मगर उसने अभी तक अपने हताहतों की संख्या पर चुप्पी साध रखी है. चो ला की घटना 11 सितंबर से 14 सितंबर 1967 के बीच घटी थी, जब भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच बड़ी लड़ाई देखने को मिली थी. सिक्किम सीमा में नाथू ला सेक्टर में चीनी घुसपैठ को रोकने के लिए भारतीय सेना ने एक लोहे की बाड़ के निर्माण क्षेत्र पर चीनी सेना को सबक सिखाया था. यह भी पढ़ें-India-China Border Tension: भारत और चीन एलएसी पर सैनिकों के पीछे हटने के लिए जल्द बैठक करने पर सहमत

उस समय ब्लैक कैट डिवीजन के अध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह थे, जो बाद में पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध के नायक बनें, जिन्होंने बांग्लादेश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. चीन ने भारत के साथ 1962 के संघर्ष और 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद यह महसूस किया कि भारत बैकफुट पर है और उसे अपने क्षेत्र के अधिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. पाकिस्तान ने भी 1965 में इसी तरह की गलत धारणाओं के आधार पर भारत के खिलाफ युद्ध शुरू किया था.

चीन ने संघर्ष के ठीक पहले हुई कुछ घटनाओं के बाद भारतीय सैनिकों को चुनौती दी। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास के दो भारतीय राजनयिकों पर कम्युनिस्ट सरकार ने जासूसी के झूठे आरोप लगाए, जिसे भारत ने खारिज कर दिया था. जब दोनों राजनयिक भारत लौटे तो उनका एक नायक के तौर पर स्वागत किया गया, विशेष रूप से लोगों ने नई दिल्ली में चीनी दूतावास की प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया गया और चीनी ध्वज को भी फाड़ दिया गया.

चीन ने 1965 में भी नाथू ला पर कब्जा करने का प्रयास किया था, लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह ने उनके प्रयासों को विफल कर दिया. वहीं वर्ष 1967 में 12 सितंबर से 14 सितंबर के बीच भारत ने चयनित स्थानों पर सटीक हमलों को अंजाम दिया। भारतीय जवानों ने तोप से हमले के साथ ही आमने-सामने की लड़ाई में भी चीनी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए और चीन की विस्तारवादी नीति को कुचल दिया. इसके बाद एक अक्टूबर, 1967 को भी चीन ने चीन-भारत सीमा के सिक्किम क्षेत्र में घुसपैठ करने का प्रयास किया, लेकिन भारतीय सैनिकों की बहादुरी और उनकी सटीक गोलीबारी ने चीनी सैनिकों को चो ला से तीन किलोमीटर तक पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

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