एन्के गौड़ा ने कैसे तय किया बस कंडक्टर से सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी बनाने तक का सफर
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

कर्नाटक के मांड्या जिले में हरलहल्ली गांव के रहने वाले एक पूर्व बस कंडक्टर एन्के गौड़ा ने वर्षो की लगन से सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी बनाई है. इसके लिए उनको इस साल पद्मश्री अवार्ड देने का एलान किया गया है.'पुस्तक माने' देश में अपने किस्म की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी है जहां विभिन्न विषयों पर 20 लाख से भी ज्यादा पुस्तकें मौजूद हैं. किताबों के प्रति एन्के गौड़ा का जुनून देखने लायक है. उनका सारा दिन इन किताबों के बीच ही गुजरता है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि वो इन किताबों को ही ओढ़ते-बिछाते हैं. अब पद्म पुरस्कार के जरिए उनके इसी जुनून को एक पहचान मिली है.

जब अवार्ड के लिए उनके नाम का एलान हुआ तो वो बस में सफर कर रहे थे. उसी समय किसी ने उनको फोन पर इसकी सूचना दी. कुछ देर बाद ही वो घर पहुंचे. तब तक वहां लोगों का तांता लगा हुआ था. उनके फोन की घंटी भी थमने का नाम नहीं ले रही थी. बधाइयों का सिलसिला लगातार जारी था.

उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में इस पुरस्कार पर खुशी जताई. उनका कहना था, "दशकों की मेहनत को इस अवार्ड के जरिए एक पहचान मिली है. अब शायद इस अनमोल खजाने के संरक्षण का कोई रास्ता भी निकल आएगा."

पांच दशक की मेहनत

77 साल के एन्के गौड़ा ने सीमित संसाधनों के बावजूद किताबों के प्रति अपने प्रेम और जुनून से यह लाइब्रेरी बनाई है. इसकी गिनती यह देश की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरियों में होती है.

वो बीते पांच दशकों से दुनिया भर से किताबें खरीदते रहे हैं और अब भी उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई है. लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिलने की वजह से वो हताश हैं. इन किताबों का संरक्षण उनके लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है. पैसों की किल्लत की वजह से वो इनकी देख-रेख के लिए कोई कर्मचारी भी नहीं रख सके हैं. फिलहाल अपने बेटे के साथ मिल कर वही इनकी देख-रेख करते हैं.

मुख्य सड़क के किनारे बनी उनकी लाइब्रेरी की इस इमारत को बाहर से देखने पर पता नहीं चलता कि इसमें ज्ञान का अनमोल खजाना भरा है. लेकिन भीतर जाने पर भारी हैरत होगी. यहां तमाम विषयों पर दुनिया भर में छपी किताबें मिल जाएंगी. यहां इतनी किताबें हैं कि चलना भी मुश्किल है. दुनिया भर में छपी शायद ही ऐसी कोई प्रमुख किताब हो जो यहां नहीं है.

गौड़ा बताते हैं कि बीते 50 वर्षों में उन्होंने 20 लाख से ज्यादा किताबें यहां जुटाई हैं. यह देश की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरियों में शामिल है. लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स समेत कई संगठनों ने इसे मान्यता दी है.

छात्रों के लिए अमोल खजाना

एक गरीब किसान परिवार में पैदा होने वाले एन्के गौड़ा ने अपने जीवन के शुरुआती दौर में बस कंडक्टर के तौर पर काम किया और साथ ही कन्नड़ साहित्य में एमए की पढ़ाई की. उसके बाद उन्होंने पास के एक चीनी कारखाने में करीब 30 साल तक काम किया. किताबों के प्रति अपने जुनून की वजह से वो अपने वेतन का करीब 80 फीसदी हिस्सा इन पर खर्च करते रहे. किताबें खरीदने के लिए उन्होंने मैसूर में अपनी संपत्ति भी बेच दी.

गौड़ा की इस लाइब्रेरी में 22 भाषाओं में 20 लाख से अधिक किताबें हैं. यह स्थानीय छात्रों और शोधार्थियों के लिए अनमोल खजाना है. इसमें दुनिया के तमाम शब्दकोश भी हैं. एन्के गौड़ा बताते हैं कि यहां तमाम भाषाओं के पांच हजार शब्दकोश हैं.

एन्के गौड़ा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "मुझे इस बात का अफसोस है कि इतनी बड़ी लाइब्रेरी होने के बावजूद मैं इसकी देख-रेख के लिए कोई सहायक नहीं रख सकता. मैंने अपनी 80 फीसदी कमाई इस लाइब्रेरी के लिए किताबें खरीदने और उनके संरक्षण पर खर्च कर दिया है. इसके लिए मैंने अपनी संपत्ति भी बेच दी. भावी पीढ़ी के लिए इन किताबों का संरक्षण जरूरी है."

उनका कहना है, "यहां पुराण, उपनिषदों और कुरान के अलावा दो से तीन सौ साल पुरानी इतिहास की किताबों के अलावा रामायण और महाभारत के तीन-तीन हजार संस्करण हैं. महात्मा गांधी पर इस लाइब्रेरी में ढाई हजार से ज्यादा किताबें हैं. इसके अलावा नोबेल पुरस्कार, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेताओं की भी किताबें यहीं रखी हैं."

एन्के गौड़ा चाहते हैं कि भावी पीढ़ी के लिए ज्ञान के इस अनमोल खजाने के संरक्षण के लिए सरकार, निजी संगठन और पुस्तक प्रेमी आगे आएं.