Harish Rana Euthanasia Case: दर्द से भरी 13 साल की जिंदगी के बाद हरीश राणा को मिली इच्छामृत्यु, मां की यादों ने कर दिया भावुक
बेटे की लगातार पीड़ा को देखते हुए हरीश के माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की थी, लेकिन 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी.
Harish Rana Euthanasia Case: साहिबाबाद के रहने वाले हरीश राणा की कहानी ने पूरे देश को भावुक कर दिया है. करीब 13 साल तक असहनीय दर्द और बिस्तर पर जिंदगी बिताने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिली. इस बीच उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए ब्रह्मकुमारी केंद्र की बहन कुमारी लवली दीदी उनके घर पहुंचीं और उन्हें शांति से विदा किया. Harish Rana Passive Euthanasia Case: कोमा में 13 साल से पड़े हरीश राणा केस में SC का ऐतिहासिक फैसला, देश में पहली बार मिली ‘इच्छामृत्यु’ की मंजूरी
मोहन नगर स्थित ब्रह्मकुमारी केंद्र के प्रभु मिलन भवन से आई कुमारी लवली दीदी ने हरीश के माथे पर चंदन का तिलक लगाया और भावुक शब्दों में कहा, “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ.” उन्होंने हरीश के लिए ध्यान (मेडिटेशन) भी किया और परिवार को ढांढस बंधाया. इस दौरान घर का माहौल बेहद भावुक हो गया.
मां को याद आया बचपन
हरीश की मां निर्मला देवी बेटे की यादों को बताते हुए कई बार भावुक हो गईं. उन्होंने कहा, “हरीश बचपन में बहुत शरारती था. जब मैं उसे डांटती थी तो वह किसी कोने में जाकर छिप जाता था. थोड़ी देर बाद फिर आकर चुपचाप मेरे गले लग जाता और मेरे चेहरे को सहलाने लगता.”
निर्मला देवी ने बताया कि हरीश उनका पहला बच्चा था, इसलिए घर में उसे सबसे ज्यादा प्यार मिला. बेटे की हालत को पिछले 13 साल से करीब से देखते हुए उनका दर्द कई बार शब्दों में नहीं आ पाता.
13 साल से झेल रहा था असहनीय दर्द
परिवार के अनुसार हरीश राणा का जन्म 12 सितंबर 1993 को दिल्ली में हुआ था. पढ़ाई में तेज हरीश ने जुलाई 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था.
साल 2013 में वह अंतिम वर्ष के छात्र थे. उसी दौरान रक्षाबंधन के दिन बहन से मोबाइल पर बात करते हुए वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए. गंभीर हालत में उन्हें तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया.
बाद में उन्हें दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में शिफ्ट किया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं. इस बीमारी के कारण उनके हाथ-पैर पूरी तरह काम करना बंद कर चुके थे और वह जिंदगी भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए.
कोर्ट तक पहुंची परिवार की लड़ाई
बेटे की लगातार पीड़ा को देखते हुए हरीश के माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की थी, लेकिन 8 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी. इस फैसले ने एक ओर जहां परिवार के लंबे संघर्ष को खत्म किया, वहीं हरीश की दर्दभरी जिंदगी की कहानी ने लोगों को गहराई से भावुक कर दिया.