नई दिल्ली/गुरुग्राम, 15 जून: दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) के एक नामी आईवीएफ (IVF) केंद्र पर जुड़वां बच्चियों के भ्रूण (Embryo) या बच्चों की कथित अदला-बदली का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. पीड़ित पिता राहुल राठौड़ (Rahul Rathore) ने डीएनए टेस्ट (DNA Test) को लेकर उठ रहे सवालों और आपत्तियों पर कड़ा रुख अपनाया है. राठौड़ ने साफ शब्दों में कहा कि उनके परिवार ने इस पूरी आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान कई तरह की जटिल मेडिकल प्रक्रियाओं का सामना किया और करीब 5 से 6 लाख रुपये खर्च किए. ऐसे में बच्चों के रूप-रंग में विसंगतियां दिखने के बाद अतिरिक्त जांच (डीएनए टेस्ट) की मांग करना पूरी तरह से तर्कसंगत और उनके अधिकारों के दायरे में है. उन्होंने कहा, "यह मेरा अधिकार है और मेरी जागरूकता है. अगर मुझे कुछ गलत लग रहा है, तो मैं अपने स्तर पर इसकी जांच जरूर कराऊंगा.' यह भी पढ़ें: Uttar Pradesh Shocker: बांदा के थाने के भीतर पिता ने 19 वर्षीय बेटी को चाकू से गोदा, अस्पताल में मौत; आरोपी गिरफ्तार
तीन महीने तक भटकने के बाद कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई FIR
पीड़ित परिवार का आरोप है कि इस बेहद संवेदनशील मामले में पुलिस और संबंधित अधिकारियों का रवैया शुरुआत में बेहद उदासीन रहा. राहुल राठौड़ के मुताबिक, उन्होंने गड़बड़ी का पता चलने पर सबसे पहले 7 जनवरी को संबंधित अस्पताल प्रशासन से संपर्क किया था. इसके बाद फरवरी में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और मार्च में राज्य के असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) विभाग को भी लिखित शिकायत दी गई, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई.
राठौड़ ने बताया कि वह लगभग तीन महीने तक एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काटते रहे। अंततः, साकेत कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया. हालांकि, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन जांच प्रक्रिया पर स्टे (रोक) लगा दिया गया, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं.
'मूल मुद्दे के बजाय कागजी औपचारिकताओं पर ध्यान'
अदालती आदेश के बाद 5 जून को इस मामले की आधिकारिक जांच दोबारा शुरू की गई. पीड़ित पिता का कहना है कि वे अब तक दो बार अदालत की कार्यवाही में शामिल हो चुके हैं और अपनी बात के समर्थन में सभी जरूरी दस्तावेज व सबूत भी सौंप चुके हैं. इसके बावजूद, जांच अधिकारी मामले की गंभीरता या मूल शिकायत की गहराई में जाने के बजाय केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन (Procedural Compliance) और कागजी औपचारिकताओं पर ही ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. राठौड़ ने आरोप लगाया कि आईवीएफ और सरोगेसी से जुड़े स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी के बहाने एक सीधे और स्पष्ट मामले को जानबूझकर पेचीदा बनाया जा रहा है.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, गुरुग्राम के रहने वाले राहुल राठौड़ और उनकी पत्नी मीनू ने संतान सुख के लिए दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित एक फर्टिलिटी क्लिनिक से आईवीएफ ट्रीटमेंट लिया था. इस साल 5 जनवरी को महिला ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया. जन्म के बाद जब बच्चियों के नैन-नक्श माता-पिता से बिल्कुल अलग दिखे, तो दंपति को गहरा संदेह हुआ. उन्होंने स्वतंत्र लैब से दो बार डीएनए टेस्ट कराया, जिसकी रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि दोनों बच्चियां जैविक (Biologically) रूप से न तो राहुल से मेल खाती हैं और न ही उनकी पत्नी से. इसके बाद पीड़ित जोड़े ने अस्पताल पर गंभीर लापरवाही और धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है ताकि उन्हें उनके असली बच्चों का पता चल सके.













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