Andhra Pradesh High Court Verdict: पति पर झूठे मुकदमे दर्ज कराना और दोषमुक्त होना मानसिक क्रूरता; आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जीवनसाथी द्वारा दर्ज कराए गए झूठे आपराधिक मामले, जिनमें आरोपी अंततः बरी हो जाता है, मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं. अदालत ने इस आधार पर पति के पक्ष में मंजूर की गई तलाक की डिग्री को सही ठहराया.
Andhra Pradesh High Court Verdict: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) ने वैवाहिक विवादों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पति या उसके परिवार पर झूठे आपराधिक मुकदमे दर्ज कराना और बाद में कोर्ट से बरी होना 'मानसिक क्रूरता' (Mental Cruelty) माना जाएगा. अदालत ने कहा कि ऐसा आचरण हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह विच्छेद (तलाक) का एक वैध और पर्याप्त आधार है.
न्यायालय ने पारिवारिक अदालत द्वारा पति के पक्ष में जारी तलाक की डिग्री को बरकरार रखते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी. यह भी पढ़ें: HC on Husband Wife and DNA Test: बच्चे की पितृत्व पर सवाल उठाना और पत्नी पर DNA टेस्ट का दबाव बनाना मानसिक क्रूरता: मद्रास हाईकोर्ट
आपराधिक मामले में बरी होना और मानसिक पीड़ा
उच्च न्यायालय की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि केवल आपराधिक शिकायत दर्ज कराना अपने आप में क्रूरता नहीं है, लेकिन जब शिकायत झूठी साबित होती है और पति व उसके परिजनों को गिरफ्तारी, जेल व लंबी अदालती प्रक्रिया का सामना करने के बाद दोषमुक्त (Acquittal) होना पड़ता है, तो यह गहरा मानसिक आघात पहुंचाता है.
अदालत ने कहा कि इस तरह के कृत्यों से व्यक्ति का सामाजिक सम्मान प्रभावित होता है और उसके मन में गहरा दुख, निराशा व तनाव पैदा होता है, जिसे क्रूरता के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा.
पति पर झूठे मुकदमे दर्ज कराना और दोषमुक्त होना मानसिक क्रूरता
29 साल के अलगाव का संदर्भ
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, दंपती का विवाह वर्षों पहले हुआ था और वे बीते लगभग तीन दशकों (29 वर्षों) से एक-दूसरे से अलग रह रहे थे. पत्नी द्वारा पति और उसके माता-पिता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (दहेज उत्पीड़न) के तहत मामला दर्ज कराया गया था, जिसमें अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में पति व उसके परिवार को बरी कर दिया था.
हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि इतने लंबे अलगाव और झूठे मुकदमों के बाद वैवाहिक संबंधों को फिर से बहाल करना असंभव हो गया है और यह रिश्ता व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुका है.
कानूनी प्रावधान और अदालती निष्कर्ष
पीठ ने स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता को साबित करने के लिए आपराधिक मुकदमों जैसी 'संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने की शर्त के बजाय परिस्थितियों की संभावनाओं (Preponderance of Probabilities) को देखा जाता है.
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर दी गई तलाक की डिग्री पूरी तरह न्यायसंगत है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.