Delhi HC: दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 67 रुपये के विवाद में कंडक्टर को 32 साल तक मुकदमा लड़ने पर DTC पर 1 लाख रुपये का जुर्माना ठोका

जांच अधिकारी ने शुरुआत में कंडक्टर को निर्दोष ठहराया था. हालांकि, अनुशासनिक प्राधिकारी ने जांच अधिकारी के फैसले से असहमति जताते हुए कंडक्टर को अगस्त 1996 में सेवा से बर्खास्त कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट (Photo Credits: File Image)

Delhi HC Decision: दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें एक बस कंडक्टर के 17 महीने के बकाए वेतन के भुगतान के आदेश को चुनौती दी गई थी. कोर्ट ने मात्र 67 रुपये के किराया विवाद से शुरू हुए इस मामले को 32 साल तक खींचने के लिए डीटीसी को कड़ी फटकार लगाई है. न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करार देते हुए डीटीसी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है.

क्या था पूरा विवाद?

यह मामला नवंबर 1994 का है, जब डीटीसी के एक बस कंडक्टर पर आरोप लगा था कि उसने साढ़े तीन यात्रियों के एक समूह से 67 रुपये का किराया तो वसूल लिया, लेकिन तीन यात्रियों को टिकट जारी नहीं किया. इस घटना के बाद कंडक्टर को निलंबित कर दिया गया था.

जांच अधिकारी ने शुरुआत में कंडक्टर को निर्दोष ठहराया था. हालांकि, अनुशासनिक प्राधिकारी ने जांच अधिकारी के फैसले से असहमति जताते हुए कंडक्टर को अगस्त 1996 में सेवा से बर्खास्त कर दिया था.

सेवा में बहाली और औद्योगिक न्यायाधिकरण का रुख

कंडक्टर द्वारा इस फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद, 1998 में डीटीसी के अध्यक्ष ने उसकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और उसे सेवा में बहाल करने का आदेश दिया. हालांकि, उसके वेतनमान को कम कर दिया गया और 17 महीने की अवधि का बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया गया.

इसके बाद यह विवाद औद्योगिक न्यायाधिकरण (Industrial Tribunal) पहुंचा. वर्ष 2004 में न्यायाधिकरण ने डीटीसी की इस कार्रवाई को अवैध ठहराया और फैसला सुनाया कि कंडक्टर नियमित वेतनमान और बकाए का हकदार है. डीटीसी ने वर्ष 2005 में इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर अदालत ने तब स्टे दे दिया था.

अदालत का कड़ा रुख और जुर्माने का वितरण

हाईकोर्ट ने डीटीसी की याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण के फैसले में दखल देने का कोई कानूनी आधार नहीं है. न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि छोटे से दावे को लेकर तीन दशकों तक मुकदमा चलाना सरकारी धन का अनावश्यक अपव्यय है.

कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि डीटीसी चाहे तो जुर्माने की 1 लाख रुपये की यह राशि उस जिम्मेदार अधिकारी से वसूल कर सकती है जिसने इस छोटे से विवाद को इतने सालों तक अदालत में खींचा.

अदालत ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि में से 25,000 रुपये संबंधित बस कंडक्टर को, 25,000 रुपये दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को और 50,000 रुपये प्रधानमंत्री राहत कोष (PM Relief Fund) में जमा कराए जाएंगे.

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