नयी दिल्ली, आठ जुलाई केंद्र सरकार ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया कि स्कूल जाने वाली किशोरियों को मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों के वितरण पर राष्ट्रीय नीति तैयार करने का काम अंतिम चरण में है।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी की दलीलों का संज्ञान लिया और संबंधित नीति तैयार करने के लिए दो महीने का समय देने का उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया।
शीर्ष अदालत कांग्रेस नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने केंद्र और राज्यों को छठी से बारहवीं कक्षा की छात्राओं को मुफ्त ‘सैनिटरी पैड’ उपलब्ध कराने तथा सभी सरकारी और आवासीय विद्यालयों में अलग महिला शौचालय की सुविधा सुनिश्चित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है।
एएसजी ने कहा कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय नीति तैयार करने का काम अंतिम चरण में है और दो महीने का समय और दिया जा सकता है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम इस मामले को सितंबर के पहले सोमवार को सूचीबद्ध करेंगे।’’
याचिका में विद्यालयों में गरीब पृष्ठभूमि की किशोरियों के सामने आने वाली कठिनाइयों को उजागर किया गया है।
केंद्र ने पहले कहा था कि वह 10 अप्रैल, 2023 और छह नवंबर, 2023 के आदेशों के अनुसार स्कूल जाने वाली लड़कियों को मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों के वितरण पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए सभी आवश्यक तथ्यों को एकत्र करने की प्रक्रिया में है।
शीर्ष अदालत ने केंद्र को देश भर के सभी सरकारी सहायता प्राप्त और आवासीय विद्यालयों में छात्राओं की संख्या के अनुरूप शौचालय बनाने के लिए एक राष्ट्रीय मॉडल तैयार करने का निर्देश दिया था।
न्यायालय ने समान प्रक्रिया पर जोर देते हुए केंद्र सरकार से राष्ट्रीय स्तर पर स्कूली छात्राओं को ‘सैनिटरी पैड’ के वितरण के लिए तैयार की गई नीति के बारे में भी पूछा।
पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि स्कूल जाने वाली लड़कियों को मुफ्त में सैनिटरी पैड के वितरण के लिए एक राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार किया गया है और हितधारकों से उनकी टिप्पणियां मांगी गई है।
पीठ ने 10 अप्रैल को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय करने तथा राष्ट्रीय नीति तैयार करने के लिए प्रासंगिक आंकड़े एकत्र करने के वास्ते नोडल अधिकारी नियुक्त किया था।
याचिका में कहा गया है कि 11 से 18 वर्ष की आयु के बीच की गरीब पृष्ठभूमि की लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि शिक्षा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत एक संवैधानिक अधिकार है।
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