वाकई लोगों की जिंदगी बदलेंगे भारत में नौकरियों के नए नियम?

भारत ने हाल ही में 29 श्रम कानूनों को हटाकर चार नए लेबर कोड लागू किए हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत ने हाल ही में 29 श्रम कानूनों को हटाकर चार नए लेबर कोड लागू किए हैं. सरकार का दावा है कि इससे कामगारों को ज्यादा सुरक्षा मिलेगी. कंपनियों के लिए नियम पालन भी सरल होगा पर मजदूर संगठन इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.भारत की केंद्र सरकार ने नए लेबर कोड लागू कर दिए हैं. इनका मकसद कामगारों को सुरक्षित काम, समय पर वेतन और सामाजिक सुरक्षा देना है. संसद ने ये चार लेबर कोड लगभग पांच साल पहले पारित कर दिए थे. इन्हें हाल ही में 21 नवंबर से लागू कर दिया गया है. अब पूरे देश में संगठित और असंगठित क्षेत्रों के लिए श्रम कानून एक जैसे होंगे.

सरकार ने वेज कोड, सामाजिक सुरक्षा कोड, औद्योगिक संबंध कोड और व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य शर्त कोड को लागू किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा है कि ये कोड कामगारों के लिए बड़े बदलाव लाएंगे. इससे रोजगार बढ़ाने और उद्योगों में पारदर्शिता लाने में मदद मिलेगी. भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लिखा कि यह स्वतंत्रता के बाद से सबसे व्यापक और प्रगतिशील श्रमिक-केंद्रित सुधार हैं. इससे कामगारों को ज्यादा ताकत मिलेगी. साथ ही, 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा मिलेगा.

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हालांकि कई मजदूर संगठनों का आरोप है कि ये कोड कंपनी मालिकों को पहले से कहीं अधिक अधिकार देते हैं. खासकर छोटी और असंगठित कंपनियों में कामगारों का शोषण बढ़ेगा. ये संगठन कहते हैं कि इन नए लेबर कोड को किसान आंदोलन और कोरोना महामारी के दौरान पेश किया गया, ताकि विपक्ष और मजदूर संगठन इसका विरोध ना कर पाएं.

क्या है नया लेबर कोड?

आजादी के बाद भी भारत में कामकाज कई दशकों तक ऐसे श्रम कानूनों के तहत चलता रहा जो 1930 और 1950 के बीच बनाए गए थे. नियम जटिल और बिखरे हुए थे. कंपनियों और कामगारों दोनों के लिए इनका पालन मुश्किल होता था. पुराने 29 श्रम कानून मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र में ही काम करते थे. जबकि देश में नौकरी करने वाले कुल 50 करोड़ लोगों में से करीब 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र में ही लगे हुए हैं. श्रम कानूनों का उन पर ही सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है.

सरकार ने पहली बार नए लेबर कोड में डिजिटल और गिग इकोनॉमी को भी शामिल किया है. रिकॉर्ड-कीपिंग और रजिस्ट्रेशन को भी डिजिटल करने की बात नियमों में है. महिला और पुरुष को एक जैसे काम के लिए समान वेतन भी मिलेगा.

भारत के संविधान में श्रम कानून कॉन्करेंट लिस्ट में आता है. इसका मतलब है कि केंद्र और राज्य दोनों लेबर से जुड़े कानून बना सकते हैं. अब केंद्र सरकार कामगारों का न्यूनतम वेतन तय करेगी. इसे ‘लेबर फ्लोर' कहते हैं. पहले की तरह राज्य वेतन तय कर सकते हैं, लेकिन यह सेंट्रल फ्लोर वेज से कम नहीं होना चाहिए. इसके साथ ही प्रतिदिन काम का समय 8 से 12 घंटे तय किया गया है.

वहीं सामाजिक सुरक्षा कोड के तहत अब देश के हर कामगार को बीमा, पेंशन और अन्य सुरक्षा लाभ मिलेंगे. पहले ग्रेच्युटी पांच साल काम के बाद मिलती थी. अब यह एक साल में भी मिल सकेगी. इसके साथ ही प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ) का दायरा बढ़ाया गया है. अब गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स भी इसका लाभ उठा सकेंगे. एक्सपर्ट मानते हैं कि इससे छोटे व्यवसायों पर भार बढ़ेगा. उन्हें कर्मचारियों के वेतन, बोनस और सुरक्षा लाभ पर अधिक खर्च करना होगा.

भारतीय उद्यमी संघ ने सरकार के इस कदम को जरुरी बताया है. उनका कहना है कि देश को वैश्विक मानकों तक पहुंचने के लिए नए लेबर कोड की आवश्यकता थी. संघ के अध्यक्ष अभिषेक कुमार सरकार के साथ कई श्रम नीतियों पर काम कर चुके हैं. वह बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र में नियम लागू करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, खासकर जहां ज्यादा अंशकालिक और मौसमी नौकरियां होती हैं.

भारत में नए लेबर कोड का असंगठित क्षेत्र पर असर होगा. लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि इन कानूनों को कितना सही और प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है. अभिषेक डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सामाजिक सुरक्षा कोड के बदलावों से इन कामगारों को फायदा होगा. लेकिन नए नियमों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ेगा और बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगा कि सरकार इन योजनाओं को कैसे डिजाइन, लागू और रोलआउट करती है. इसको लेकर अभी सरकार ने कोई स्पष्ट योजना नहीं बताई है."

क्यों हो रहा है विरोध?

मजदूर संगठन और श्रमिक संघ सरकार के बनाए चार लेबर कोड का विरोध कर रहे हैं. कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम) और कांग्रेस ने भी आपत्ति जताई है. जयराम रमेश ने कहा कि 29 पुराने कानूनों को चार कोड में फिर से री- पैक किया गया है. इससे असल में कोई सुधार नहीं आएगा. इसके नियम अभी तक नोटिफाई भी नहीं हुए हैं. कामगारों की पांच मुख्य मांगों में न्यूनतम 400 रुपये मजदूरी, शहरों में रोजगार गारंटी और सरकारी क्षेत्रों में कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों पर रोक शामिल थी. जो नए लेबर कोड में नहीं हैं.

भारत क्रांतिकारी मजदूर संगठन के संयोजक योगेश स्वामी डीडब्ल्यू को बताते हैं कि सरकार पूरे देश में न्यूनतम वेतन तय करने की बात कर रही है. लेकिन कुछ शहर जैसे दिल्ली और मुंबई महंगे हैं. जो कामगार बिहार में 10 हजार रुपये में रह सकता है, वह दिल्ली में इतने पैसे में गुजारा नहीं कर सकता. इसके अलावा, नए नियमों के तहत हड़ताल करने वाले कामगारों को 60 दिन पहले नोटिस देना होगा.

योगेश डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार ने पूंजीपतियों के लिए नियमों को और लचीला बना दिया है. मजदूर सालों से ड्यूटी के समय में बदलाव की मांग कर रहे थे. लेकिन नए कोड के तहत मालिक अब 8 घंटे की जगह 10 से 12 घंटे तक काम करा सकते हैं. इन कानूनों ने छंटनी करना आसान कर दिया गया है. सैलरी बढ़ाने की भी कोई बात नहीं की गई है.”

नए लेबर कोड के अनुसार 300 या उससे कम कामगारों वाली कंपनियों को कुछ कदम उठाने के लिए सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी. यदि कंपनी को किसी कारण से कामगारों को निकालना या फैक्ट्री बंद करनी पड़े, तो उन्हें सरकार की मंजूरी नहीं चाहिए. इससे कामगारों को मिलने वाली सुरक्षा और सुविधाएं सीमित हो जाएंगी.

इस पर क्रांतिकारी मनरेगा मजदूर यूनियन के सदस्य अजय कुमार बताते हैं, "पहले यह नियम 100 कामगारों वाली कंपनियों के लिए था. इसलिए अब औपचारिक क्षेत्र के कामगार भी असंगठित क्षेत्र में शामिल हो जाएंगे. यहां शोषण होने पर अब कामगार लेबर कोर्ट नहीं जा सकते. साथ ही नए कोड में शक्ति राज्य सरकार से केंद्र सरकार को चली जाएगी. चूंकि मजदूर संगठन आमतौर पर राज्य सरकार से ही बातचीत करते हैं. हमारा प्रभाव घट जाएगा.”

क्या नए लेबर कोड का वाकई असर होगा?

भारत में असंगठित क्षेत्र की केवल 31 प्रतिशत इकाइयां किसी कानून के तहत पंजीकृत हैं. बाकी 69 प्रतिशत कहीं भी दर्ज नहीं हैं. यानी उन इकाइयों की संख्या बहुत कम है जहां लेबर कोड लागू होगा.

वहीं अधिकांश नियम असंगठित क्षेत्र के उद्यमों पर लागू नहीं होते. गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को मान्यता दी गई है लेकिन उन्हें स्थायी कामगारों के बराबर अधिकार नहीं दिए गए हैं. लॉ फर्म खेतान एंड कंपनी में पार्टनर अंशुल प्रकाश ने डीडब्ल्यू से बात की. वह बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र में कामगारों को पेड छुट्टियां, नौकरी की सुरक्षा और छंटनी से बचाव जैसे फायदे नहीं मिलेंगे.

अंशुल कहते हैं, "नए लेबर कोड का असर कंस्ट्रक्शन, छोटे कारखानों, गिग वर्क, माइक्रो और छोटे व्यवसाय पर ज्यादा पड़ेगा. यहां इन्हें लागू करने में चुनौतियां आएंगी. आईटी जैसे सेक्टर पहले से अधिक संगठित हैं. वहां इन्हें अपनाना काफी आसान होगा. नए कोड को लागू करना राज्यों की क्षमता पर भी निर्भर करता है."

राज्यों में पहले से उनके बनाए लेबर कानून चल रहे हैं. ऐसे में हर राज्य को नए नियम अपनाने में अलग-अलग समय लग सकता है. अंशुल के मुताबिक ऐसे हालात में कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों के लिए स्थिति असमान हो सकती है. एक राज्य में नए नियम चल रहे होंगे, जबकि दूसरे राज्य में पुराने नियम ही लागू होंगे. इस वजह से कंपनियों को जगह-जगह अलग तरीके से काम करना पड़ेगा, जिससे उनका काम थोड़ा मुश्किल और उलझन भरा हो सकता है.

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