देश की खबरें | उप्र: भाजपा विधायक ने धार्मिक पुस्तकों के अपमान को रोकने के लिए विशिष्ट कानून बनाने की मांग की

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सरोजनी नगर क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक राजेश्वर सिंह ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर धार्मिक पुस्तकों के अपमान को रोकने के लिए विशिष्ट कानून बनाने की मांग की है, क्योंकि मौजूदा कानून ‘‘पर्याप्त नहीं’’ हैं। उन्होंने शनिवार की रात यहां जारी एक बयान में यह जानकारी दी।

लखनऊ, दो सितंबर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सरोजनी नगर क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक राजेश्वर सिंह ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर धार्मिक पुस्तकों के अपमान को रोकने के लिए विशिष्ट कानून बनाने की मांग की है, क्योंकि मौजूदा कानून ‘‘पर्याप्त नहीं’’ हैं। उन्होंने शनिवार की रात यहां जारी एक बयान में यह जानकारी दी।

विधायक ने सुझाव दिया है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में संशोधन के माध्यम से एक विशिष्ट धारा जोड़ी जा सकती है, जिसके तहत लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से की गई धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी को दंडनीय बनाया जा सकता है और अधिकतम पांच वर्ष तक के कठोर कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया जा सकता है।

सिंह ने धार्मिक ग्रंथों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए विधायी ढांचे पर फिर से काम करने को लेकर केंद्रीय कानून मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है।

सिंह ने अपने पत्र में कहा, ‘‘भारतीय समाज ने पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस से लेकर कुरान, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहिब तक धार्मिक ग्रंथों को हमेशा सम्मान और श्रद्धा दी है।’’

उन्होंने पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि उत्तर प्रदेश धार्मिक ग्रंथों की सुरक्षा के लिए एक सामान्य कानून पारित कर सकता है, हालांकि एक अधिसूचना के जरिए कुछ पुस्तकों को मौजूदा कानून में एक अनुसूची (जैसे 295एए) में जोड़कर शामिल किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे कई उदाहरण हैं जब कुछ समूहों ने धार्मिक ग्रंथों पर हमला किया या उनका उपहास उड़ाया या उनका अपमान किया। ऐसी घटनाएं लोगों की धार्मिक भावनाओं पर हमला करती हैं और परिणामस्वरूप, राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को बाधित करती हैं। वर्तमान में ऐसा कोई विशिष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है जो धार्मिक ग्रंथों के धार्मिक महत्व को पहचानता हो और न ही कोई ऐसा विशिष्ट प्रावधान है जो उनकी अवमानना या अपमान को अपराध मानता हो।''

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