विदेश की खबरें | यूक्रेन: क्या रूसी सैनिकों के विद्रोह करने और भाग जाने की खबरें सच हैं? यह पहले भी हुआ है
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. कोलचेस्टर, चार अप्रैल (द कन्वरसेशन) हाल के दिनों में कुछ ऐसी खबरें सामने आई हैं कि यूक्रेन में युद्धरत रूसी सैनिकों ने, आगे न बढ़ पाने और कई सैन्य असफलताओं के कारण अपने उपकरणों को तोड़ दिया है, लड़ने और आदेशों को मानने से इनकार कर दिया है। और एक खबर में तो यहां तक कहा गया है कि वह अपने कमांडर पर चढ़ दौड़े।
कोलचेस्टर, चार अप्रैल (द कन्वरसेशन) हाल के दिनों में कुछ ऐसी खबरें सामने आई हैं कि यूक्रेन में युद्धरत रूसी सैनिकों ने, आगे न बढ़ पाने और कई सैन्य असफलताओं के कारण अपने उपकरणों को तोड़ दिया है, लड़ने और आदेशों को मानने से इनकार कर दिया है। और एक खबर में तो यहां तक कहा गया है कि वह अपने कमांडर पर चढ़ दौड़े।
नाटो का अनुमान है कि करीब दो महीने पहले शुरू हुई लड़ाई में कुल मिलाकर 15,000 रूसी सैनिक मारे जा चुके हैं, यह आंकड़ा अफगानिस्तान में नौ साल में मारे गए सभी सोवियत सैनिकों के बराबर है। कहा जा रहा है कि युद्धरत रूसी सैनिकों का मनोबल अविश्वसनीय रूप से कम है। इस स्थिति में, रूसी सेना के पलायन की प्रबल आशंका है।
पलायन करना- या अपनी सैन्य इकाई को छोड़ना - किसी भी सेना को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर कर सकता है, यूक्रेन की कोशिश है कि रूसी सैनिक अपनी सैन्य इकाइयां छोड़कर भाग जाएं या पाला बदलकर उसकी सेना में शामिल हो जाएं। इससे वह दुश्मन की महत्वपूर्ण अंदरूनी खुफिया जानकारी प्राप्त कर सकता है, जो यूक्रेन को इस युद्ध में लाभ की स्थिति में लाने में सहायक हो सकता है।
यह पहली बार नहीं होगा कि रूसी या सोवियत सैनिकों ने संघर्ष के समय आदेश मानने और सहयोग करने से इनकार कर दिया है। रुसो-जापानी युद्ध के दौरान, युद्धपोत पोटेमकिन पर सवार रूसी सैनिकों ने जून 1905 में विद्रोह कर दिया था। दरअसल इससे पिछले महीने त्सुशिमा की लड़ाई में रूसी बेड़े का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो गया था और रूसी नौसेना के पास कुछ सबसे अनुभवहीन रंगरूट ही रह गए थे। उन्हें बेहद खराब हालात में काम करना पड़ रहा था और यहां तक कि उन्हें ठीक से खाना भी नहीं मिल पा रहा था। इससे परेशान होकर, 700 नाविकों ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली युद्धपोतों में से एक पर अपने ही अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध में, जोसेफ स्टालिन ने आत्मसमर्पण के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति को लागू करके सेना की आज्ञाकारिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया। जुलाई 1942 में जारी ‘‘आदेश संख्या 227’’ में कहा गया कि जो भी सैनिक पीछे हटे, उन्हें विशेष इकाइयों द्वारा तुरंत मार दिया जाए। कुछ अनुमानों के अनुसार, इन इकाइयों ने अपने ही 150,000 सैनिकों को मार डाला था। फिर भी, 14 लाख से अधिक सोवियत युद्धबंदियों ने जर्मन सैनिकों के साथ लड़ने का विकल्प चुना। किसी भी अन्य सहयोगी सेना में इतना दलबदल कभी नहीं हुआ।
कई दशकों बाद, अफगानिस्तान के साथ सोवियत संघ के संघर्ष ने लाल सेना ने कई और चुनौतियों का सामना किया। सोवियत सेना में ऐसे सैनिक शामिल थे जिनके पास गुरिल्ला युद्ध का कोई प्रशिक्षण नहीं था, और उन्हें अपने मिशन के बारे में भी बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। मध्य एशियाई और बाल्टिक गणराज्यों के रंगरूटों के बीच अपनी ही सेना का प्रतिरोध आम था, भले ही हुकुमउदूली करना एक गंभीर अपराध था। कई सोवियत सैनिकों का उन अत्याचारों से मोहभंग हो गया था जिन्हें उन्हें निर्दोष नागरिकों के खिलाफ करने के लिए मजबूर किया गया था।
चेचन्या (1994-96) के साथ रूस के पहले संघर्ष में भी पलायन व्यापक था, जहां कई लोगों को बिना किसी प्रशिक्षण के सबसे कठिन संघर्ष वातावरण में लड़ने के लिए भेजा गया था।
यूक्रेन में इतने भगोड़े क्यों हैं?
युद्ध में दल-बदल और पलायन आम बात है। होता यह है कि युद्ध के समय की कठिनाइयाँ, खराब युद्ध प्रदर्शन और युद्ध के कारण के प्रति एक विचारधारात्मक प्रतिबद्धता न होने से सैनिक युद्ध से हटने लगते हैं। लेकिन यूक्रेन में युद्ध के कुछ ही हफ्तों में रूसी सैनिक मनोबल की कमी और सैन्य सहयोग के अभाव का अनुभव कर रहे हैं।
शोध से पता चलता है कि उन सैनिकों में मनोबल विशेष रूप से कम है जो गैर पेशेवर हैं। इन खबरों के बावजूद कि रूस की सेना अपने ढांचे में सुधार का प्रयास कर रही थी, रूस की अपनी सेना ने 2014 में इस आशय की सूचना दी थी कि उसके 25% से अधिक कर्मी अपने उपकरण संचालित नहीं कर पाते।
हालांकि पुतिन के सुधारों के परिणामस्वरूप सेना के लिए कुल बजट में तो वृद्धि हुई, लेकिन सैनिकों के वेतन में नहीं। अनुबंधित सैनिकों (जो तीन साल की अवधि के लिए काम करते हैं) को अमेरिकी समकक्षों की तुलना में 200% कम भुगतान किया जाता है, अमेरिकी सैनिक लगभग 1,000 अमेरिकी डॉलर प्रति माह प्राप्त करता है, जबकि रूसी सिपाहियों को केवल 25 अमेरिकी डॉलर प्रति माह का भुगतान किया जाता है, और उन्हें प्रशिक्षण भी कम प्राप्त होता है। यह सब कम मनोबल में योगदान देता है और पलायन तथा दलबदल के जोखिम को बढ़ाता है।
रूस न केवल यूक्रेनी लोगों के दिल और दिमाग को जीतने में विफल रहा है, बल्कि अब यह अपनी सेना के दिल और दिमाग को जीतने के लिए भी संघर्ष कर रहा है।
द कन्वरसेशन एकता
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)