देश की खबरें | दो पूर्व सीईसी ने शिवसेना के चुनाव चिह्न पर निर्वाचन आयोग के फैसले को सही माना
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों (सीईसी) ने शिवसेना के चुनाव चिह्न से संबंधित विवाद पर निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए फैसले का समर्थन किया है। उनका कहना है कि आयोग ने कई बार परखे गए सिद्धांत के आधार पर फैसला किया है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि फैसले में ‘‘खामी’’ है क्योंकि निर्णय पर पहुंचने के लिए उद्धव ठाकरे गुट की संगठनात्मक इकाई की संख्या का आकलन नहीं किया गया।
नयी दिल्ली, 24 फरवरी दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों (सीईसी) ने शिवसेना के चुनाव चिह्न से संबंधित विवाद पर निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए फैसले का समर्थन किया है। उनका कहना है कि आयोग ने कई बार परखे गए सिद्धांत के आधार पर फैसला किया है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि फैसले में ‘‘खामी’’ है क्योंकि निर्णय पर पहुंचने के लिए उद्धव ठाकरे गुट की संगठनात्मक इकाई की संख्या का आकलन नहीं किया गया।
निर्वाचन आयोग ने गत शुक्रवार को (महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री) एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को वास्तविक शिवसेना माना और दिवंगत बाल ठाकरे द्वारा स्थापित अविभाजित शिवसेना का चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ शिंदे गुट को आवंटित कर दिया।
अप्रैल 2021 से मई 2022 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे सुशील चंद्रा ने कहा कि ऐसे मामलों (पार्टी के भीतर चुनाव चिह्न का विवाद) में निर्वाचन आयोग ने हमेशा सादिक अली मामले में उच्चतम न्यायालय के रुख का अनुपालन किया है।
उन्होंने रेखांकित किया कि शीर्ष अदालत ने माना कि निर्वाचन आयोग ऐसे मामलों में फैसला लेने के लिए एकमात्र उचित प्राधिकार है।
चंद्रा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने भी कोई अंतरिम स्थगन नहीं दिया है जिसकी मांग उद्धव ठाकरे गुट की ओर से की गई थी।
उल्लेखनीय है कि ठाकरे नेतृत्व वाले गुट को गत बुधवार को उस समय झटका लगा जब उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग द्वारा शिंदे गुट को असली शिवसेना मानने और ‘धनुष बाण’ का चुनाव चिह्न आवंटित करने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
शीर्ष अदालत ने पार्टी की संपत्तियों और बैंक खातों को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश देने से भी इनकार कर दिया। हालांकि, पीठ ने कहा कि वह ठाकरे की याचिका पर सुनवाई कर रही है लेकिन ‘‘वह इस समय स्थगन आदेश नहीं दे सकती क्योंकि वे (शिंदे गुट) निर्वाचन आयोग के समक्ष सफल हो चुके हैं।’’
शीर्ष अदालत मंगलवार को निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ ठाकरे गुट की याचिका पर सुनवाई को सहमत हो गई।
जुलाई 2010 से जून 2012 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एस वाई कुरैशी ने भी कहा कि निर्वाचन आयोग का आदेश ‘‘उम्मीदों के अनुरूप’’ है।
उन्होंने कहा कि सांसदों और विधायकों (पार्टी के विधायक दल) की संख्या ‘‘हमेशा’’ फैसला लेने में अहम होती है।
कुरैशी ने उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 1971 में दिए गए फैसले को याद किया जिसमें कहा गया था कि अंतर पार्टी विवाद संपत्ति विवाद नहीं है जहां पर परिवार लड़ते हैं और संपत्ति विभाजित की जाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘ इसमें विजेता सबकुछ ले जाता है... अगर एक गुट पार्टी है (या सामान्य में मूल पार्टी है), तो पार्टी में विभाजन का सवाल ही नहीं है।’’
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